जैसलमेर (राजस्थान, भारत): राजस्थान की भील जनजाति से संबंध रखने वाले वरिष्ठ कलाकार टागा राम भील को कला–गायन के क्षेत्र में उनके विशिष्ट योगदान के लिए वर्ष 2026 का प्रतिष्ठित पद्मश्री पुरस्कार प्रदान किया गया है। यह सम्मान आदिवासी लोककला और पारंपरिक गायन के संरक्षण व प्रचार के लिए उनके आजीवन समर्पण की राष्ट्रीय स्तर पर सराहना है।
श्री टागा राम भील राजस्थान के एक दूरस्थ आदिवासी क्षेत्र से निकलकर देशभर में पहचान बनाने वाले कलाकार हैं। उन्होंने भील समाज की पारंपरिक लोकगीत परंपरा, जीवनशैली, संघर्ष, प्रकृति प्रेम और सांस्कृतिक मूल्यों को अपने गायन के माध्यम से जीवंत रखा। बदलते समय और आधुनिक प्रभावों के कारण विलुप्त होती जा रही आदिवासी लोककला को उन्होंने नई पहचान दिलाई।
उन्होंने दशकों तक गांव-गांव, मेलों, सामाजिक व सांस्कृतिक आयोजनों, राज्य तथा राष्ट्रीय स्तर के मंचों पर अपनी कला का प्रदर्शन किया। उनके लोकगीतों के माध्यम से भील जनजाति की संस्कृति राजस्थान की सीमाओं से बाहर निकलकर पूरे देश तक पहुंची। उल्लेखनीय बात यह है कि उन्होंने किसी औपचारिक संगीत शिक्षा के बिना, पारंपरिक विरासत और अनुभव के बल पर लोकगायन में एक विशिष्ट स्थान प्राप्त किया।
श्री टागा राम भील का योगदान केवल गायन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उन्होंने नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जुड़ने की प्रेरणा दी। आज अनेक युवा आदिवासी कलाकार लोककला और लोकसंगीत की ओर आकर्षित हो रहे हैं, जिसमें उनके कार्य की अहम भूमिका मानी जा रही है। उनका मानना रहा है कि लोककला केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि समाज का इतिहास, जीवन दर्शन और सामूहिक स्मृति होती है।
पद्मश्री पुरस्कार की घोषणा के बाद राजस्थान सहित पूरे देश से उन्हें बधाइयाँ मिल रही हैं। उनके सम्मान से यह संदेश गया है कि आदिवासी समाज की कला और संस्कृति को भी राष्ट्रीय स्तर पर उचित पहचान और सम्मान मिल सकता है। यह पुरस्कार केवल श्री टागा राम भील का नहीं, बल्कि समूची भील जनजाति और भारत की आदिवासी लोककला परंपरा का गौरव माना जा रहा है।
सांस्कृतिक क्षेत्र के जानकारों का मानना है कि श्री टागा राम भील के मिले पद्मश्री सम्मान से आदिवासी लोकगायन और पारंपरिक कलाओं के संरक्षण को नई ऊर्जा मिलेगी।
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