
विदर्भ के आदिवासी समाज की शैक्षणिक जागृति के इतिहास में झुल्लाबाई मडावी (कुमरे) का नाम अत्यंत सम्मान के साथ लिया जाना चाहिए। वे एक महान, दूरदर्शी और कर्मठ महिला थीं। आज भले ही उनके कार्य को पर्याप्त मान्यता नहीं मिल रही हो, परंतु उनके योगदान का ज़िक्र किए बिना नागपुर शहर में आदिवासी महिला शिक्षा का इतिहास अधूरा रहेगा।
प्रारंभिक जीवन और शिक्षा
माता झुल्लाबाई मडावी (कुमरे) का जन्म १ अप्रैल १९०६ को नागपुर के पुराने फुटाला बस्ती में कुमरे परिवार में हुआ। वह समय ब्रिटिश शासन का था और समाज में महिलाओं की शिक्षा पर अत्याधिक सीमाएँ और प्रतिबंध थे। ऐसी प्रतिकूल परिस्थिति में भी उन्होंने १९१२ से १९२० के दौरान नागपुर के सिविल लाइंस में स्थित सेंट उर्सुला गर्ल्स हाईस्कूल में पढ़ाई कर आठवीं कक्षा तक की शिक्षा पूर्ण की। उस समय किसी आदिवासी गोंड महिला का आठवीं तक शिक्षित होना अत्यंत गौरवपूर्ण और क्रांतिकारी बात थी। इस प्रकार वे आदिवासी समाज में शिक्षा जागरण की प्रथम पीढ़ी की अग्रणी बनीं।
गोंड सभा गर्ल्स स्कूल की स्थापना
सन् १९२६ में झुल्लाबाई मडावी ने कुछ समाजहितैषी व्यक्तियों के सहयोग से नागपुर के गड्डीगोदाम क्षेत्र में गोंड सभा गर्ल्स स्कूल की स्थापना की। इस पाठशाला का मुख्य उद्देश्य नागपुर शहर के आदिवासी समाज की बालिकाओं तथा अन्य समाज की महिलाओं को शिक्षा प्राप्त करने का अवसर प्रदान करना था। वे इस संस्था की मुख्य संस्थापिका और प्रथम प्रधानाध्यापिका बनीं। विशेष बात यह है कि पाठशाला की दो मंजिला इमारत के निर्माण के लिए उन्होंने स्वयं की आर्थिक पूंजी लगा दी। उस समय किसी आदिवासी महिला द्वारा ऐसा साहसिक और दूरदर्शी कदम उठाना अत्यंत प्रेरणादायक था।
इस पाठशाला की ऐतिहासिक इमारत आज भी अभिमान के साथ खड़ी है। यहाँ अब पुस्तकालय, अध्ययन कक्ष और कुछ शिक्षा उपक्रम चलाए जाते हैं।
आदर्श प्रधानाध्यापिका के रूप में सम्मान
झुल्लाबाई मडावी के कुशल नेतृत्व और शिक्षा के प्रति निष्ठा के कारण ६ मार्च १९४८ को सरकार ने उन्हें “Best Head Mistress” पुरस्कार से सम्मानित किया। यह सम्मान उनके शैक्षणिक कार्य और विद्वत्ता की स्वीकृति था। आदिवासी समाज, विशेषकर आदिवासी महिलाओं के लिए यह अत्यंत गौरव का क्षण था।
समाज निर्माण की छाप
झुल्लाबाई मडावी ने केवल पाठशाला की स्थापना ही नहीं की, बल्कि अनेक आदिवासी बालिकाओं में शिक्षा के प्रति रुचि उत्पन्न कर उन्हें सक्षम बनाया। उनके मार्गदर्शन में शिक्षित अनेक छात्राएँ आगे चलकर नागपुर महानगरपालिका में प्रधानाध्यापिका के पद पर कार्यरत रहीं और सफलतापूर्वक सेवानिवृत्त हुईं। इनमें प्रमुख नाम हैं कुमारी शकुंतला तुकाराम मडावी (बाद में ऊईके), कुमारी ललिता तुकाराम मडावी (बाद में कोबे), सुभद्राबाई आत्राम (बाद में मडावी), जयतुलाबाई आत्राम (बाद में मसराम), शारदाबाई धुर्वे, सतवंती सलाम (बाद में किलनकर) और लीलाताई आत्राम। इन सभी महिलाओं की सफलता के पीछे झुल्लाबाई के संस्कार, शिक्षा के प्रति रुचि, अनुशासनप्रियता और समाजसेवा की प्रेरणा थी।
परिवार में शिक्षा परंपरा
झुल्लाबाई मडावी की दो पुत्रियाँ थीं। उनकी बड़ी पुत्री कुमारी सरस्वती दौलतराव मडावी (विवाहोपरांत सरस्वतीबाई सिताराम वाकडे) ने आठवीं कक्षा तक शिक्षा प्राप्त की। आगे चलकर उन्होंने नागपुर के सेवासदन विद्यालय से प्राथमिक शिक्षक का प्रशिक्षण पूर्ण कर नागपुर महानगरपालिका में प्रधानाध्यापिका के रूप में कार्य किया और सन् १९८१ में सेवानिवृत्त हुईं।
दूसरी पुत्री कुमारी दमयंती दौलतराव मडावी उस समय अंग्रेजी माध्यम से SSC परीक्षा उत्तीर्ण होने वाली प्रथम आदिवासी गोंड महिलाओं में से एक थीं। यह आदिवासी समाज के लिए अत्यंत गर्व का पड़ाव था।
अंतिम यात्रा
शिक्षा सेवा, समाज जागृति और आदिवासी महिला सशक्तिकरण के लिए जीवनभर संघर्ष करने वाली झुल्लाबाई मडावी (कुमरे) का निधन १५ नवंबर १९७३ को हुआ। उनके निधन से आदिवासी समाज ने एक दूरदर्शी शिक्षाप्रेमी, मार्गदर्शक और आदर्श व्यक्तित्व को खो दिया।
विस्मृत होता योगदान
आज महिलाओं की शिक्षा के लिए, विशेष कर आदिवासी महिलाओं और आदिवासी गोंड समाज की महिलाओं की शिक्षा के लिए दिए गए उनके अमूल्य योगदान की पर्याप्त सराहना नहीं हो रही है, जो अत्यंत खेदजनक है। समाज के लिए अपना जीवन समर्पित करनेवाली और अनेक पीढ़ियों का निर्माण करनेवाली झुल्लाबाई मडावी को उनके कार्यानुरूप सम्मान नहीं मिला है। जिस सम्मान की वे अधिकारी हैं वह समाज और शासन द्वारा प्रदान किया जाना चाहिए।
भारत सरकार उन्हें आधिकारिक रूप से सम्मानित करे तो वही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी। उनके कार्य का अध्ययन, विद्यालय के इतिहास का दस्तावेजीकरण तथा उनके नाम पर शैक्षणिक पुरस्कार या स्मारक की स्थापना ही उनके कार्य का उचित सम्मान होगा।
झुल्लाबाई मडावी केवल एक विद्यालय की संस्थापिका नहीं थीं, बल्कि आदिवासी महिला शिक्षा की क्रांति की अग्रदूत थीं। प्रतिकूल सामाजिक परिस्थितियों से उभरकर उन्होंने शिक्षा के माध्यम से समाज परिवर्तन का कार्य किया। उनका जीवनकार्य प्रेरणादायक, गौरवपूर्ण और आदर्श है। आज आवश्यकता है कि उनके कार्य का पुनः स्मरण कर नई पीढ़ी को उनसे प्रेरणा दी जाए। ऐसी महान शिक्षाप्रेमी को विनम्र नमन।
लेखक: अधि. दादाभाऊ तळपे (सेवानिवृत्त उपसंचालक, भूमि अभिलेख, महाराष्ट्र राज्य)
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