नई दिल्ली (भारत): १२-दिवसीय ट्राइब्स आर्ट फेस्ट २०२६ (टीएएफ) का यहां शुक्रवार को त्रावणकोर पैलेस में एक शानदार समारोह के साथ समापन हुआ। इस उत्सव का आयोजन भारत सरकार के जनजातीय कार्य मंत्रालय द्वारा आदिवासी कला परंपराओं को बढ़ावा देने और आदिवासी कलाकारों के लिए आजीविका के अवसरों को सुदृढ़ करने के प्रयासों के तहत किया गया था।
आधिकारिक प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, उत्सव के दौरान आदिवासी कलाकृतियों की प्रत्यक्ष बिक्री १.२५ करोड़ रुपये (लगभग १३५,०११ अमेरिकी डॉलर) से अधिक रही। संग्रहकर्ताओं, खरीदारों और कला प्रेमियों ने इस उत्सव में ८०० से अधिक आदिवासी कला कृतियां खरीदी। आयोजकों ने कहा कि यह आदिवासी कला के प्रति बढ़ती सार्वजनिक सराहना और मुख्यधारा के कला बाजारों में इसकी व्यावसायिक व्यवहार्यता का प्रमाण है।
इसके अलावा १०,००० से अधिक आगंतुक प्रदर्शनी में आए, जहां उन्होंने विविध कलात्मक परंपराओं के साथ सहभागिता की। उत्सव में १,००० से अधिक कलाकृतियां प्रदर्शित की गईं, जो भारत के विभिन्न क्षेत्रों से लगभग ७० आदिवासी कलाकारों द्वारा निर्मित ३० से अधिक आदिवासी कला रूपों का प्रतिनिधित्व करती थीं। समकालीन कलाकारों ने भी आदिवासी कलाकारों के साथ सहयोग किया, जिससे ऐसी कृतियां तैयार हुईं जिनमें पारंपरिक तकनीकों और आधुनिक अभिव्यक्ति का मिश्रण था।
भारत के जनजातीय कार्य मंत्री जुअल ओराम समापन समारोह के मुख्य अतिथि थे। संस्कृति और पर्यटन मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत, दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता, जनजातीय कार्य राज्य मंत्री दुर्गादास उइके और अन्य गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे। कलाकारों को आदिवासी कला में उत्कृष्टता और योगदान के लिए सम्मानित किया गया। अपने भाषण में ओराम ने कहा: “भारत के आदिवासी समुदायों के पास कला, संस्कृति, विरासत, पाक परंपराओं और पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों का असाधारण भंडार है, जो वास्तव में अद्वितीय है। ये जीवंत परंपराएं प्रकृति, समुदाय और पीढ़ियों से चली आ रही ज्ञान परंपरा के साथ गहरे संबंध को दर्शाती हैं।”
समापन समारोह के दौरान विभिन्न कलाकारों को पाँच श्रेणियों में आदिवासी कला में उत्कृष्टता और योगदान के लिए सम्मानित किया गया –
जनजातीय कला में सर्वश्रेष्ठ कलाकार – राजेश चैत्य वांगड़
जनजातीय कला में युवा उपलब्धि हासिल करनेवाले – धनेश्वर धुर्वे और सुश्री सुधा कुमारी
जनजातीय कला में नवाचार – लैशराम मेम्बी देवी
जनजातीय कला को पुनर्जीवित करने वाले कलाकार – बालासुब्रमणि
जनजातीय कला में आजीवन योगदान – पुतली गंजू
इस उत्सव का उद्देश्य आदिवासी कलाकारों, संग्रहकर्ताओं, संस्थानों और आम जनता के बीच स्थायी संबंध स्थापित करना था, जिससे बाजार तक व्यापक पहुंच और मान्यता के मार्ग तैयार हो सकें।
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