मेळघाट का नाम आते ही हमारे सामने दो तस्वीरें उभरती हैं। पहली तो प्राकृतिक संपदा और जैवविविधता से भरपूर घने जंगलों की। दूसरी दशकों से जूझते आदिवासी जीवन की, जहाँ कुपोषण, बालमृत्यु और मातामृत्यु आज भी कड़वी सच्चाई हैं। हाल ही में मुंबई उच्च न्यायालय की कठोर टिप्पणियों ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि राज्य की प्राथमिकताएँ आखिर हैं क्या?
न्यायालय ने साफ कहा कि जब कल्याणकारी योजनाओं के लिए हजारों करोड़ रुपये उपलब्ध हो सकते हैं, तो मेळघाट जैसे आदिवासी क्षेत्रों के लिए बुनियादी सुविधाओं जैसे स्वास्थ्य, पोषण, सड़क और शिक्षा के लिए संसाधनों की कमी का तर्क कैसे स्वीकार्य हो सकता है? यह टिप्पणी केवल प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि नीति-निर्माण की गंभीर विफलता की ओर इशारा करती है।
इसी पृष्ठभूमि में राज्य के वन विभाग द्वारा शुरू किया गया ‘मेळघाट पैशन ट्रेल’ सवालों के घेरे में है। इस पहल के तहत देशभर के सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स और ब्लॉगर्स को आमंत्रित कर मेळघाट के पर्यटन को बढ़ावा देने का प्रयास किया जा रहा है। पाँच सितारा सुविधाओं के साथ तीन दिन का यह कार्यक्रम निश्चित रूप से प्रचार-प्रसार के लिहाज से आकर्षक हो सकता है, लेकिन क्या यह सही समय और सही प्राथमिकता है?
पर्यावरणवादियों की आपत्ति यहीं से शुरू होती है। उनका कहना है कि जिस क्षेत्र में आज भी बच्चों को पर्याप्त पोषण नहीं मिल पा रहा और जहाँ स्वास्थ्य सेवाएँ न्यूनतम स्तर पर हैं, वहाँ सरकारी संसाधनों का उपयोग ‘इमेज बिल्डिंग’ पर करना क्या नैतिक रूप से उचित है? यह तर्क पूरी तरह खारिज भी नहीं किया जा सकता।
सरकार का पक्ष भी समझना भी जरूरी है। राज्य के वन मंत्री गणेश नाईक के अनुसार इस पहल का उद्देश्य इको-टूरिज्म को बढ़ावा देना, स्थानीय रोजगार सृजित करना और मेळघाट को वैश्विक पहचान दिलाना है। सिद्धांततः यह सोच ग़लत नहीं है। पर्यटन से आय बढ़ती है, स्थानीय लोगों को रोजगार मिलता है और क्षेत्र का विकास भी संभव होता है।
लेकिन यहाँ मूल प्रश्न “क्या” का नहीं, “कब” और “कैसे” का है। जब बुनियादी जरूरतें ही अधूरी हों, तब विकास के दिखावटी मॉडल पर जोर देना ‘नींव कमजोर, इमारत ऊँची’ जैसी स्थिति पैदा करता है। मेळघाट में यदि अस्पतालों की कमी है, सड़कें जर्जर हैं और पोषण योजनाएँ प्रभावी नहीं हैं, तो पर्यटन से होने वाला संभावित लाभ भी सीमित ही रहेगा।
एक और चिंताजनक पहलू इस कार्यक्रम की पारदर्शिता से जुड़ा है। इन्फ्लुएंसर्स के चयन का आधार क्या था? इस पर कितना खर्च हुआ? और क्यों एक सरकारी कार्यक्रम को केवल एक मीडिया संस्थान तक सीमित रखा गया? ये सवाल केवल प्रक्रिया पर नहीं, बल्कि शासन की जवाबदेही पर भी सवाल खड़े करते हैं।
दरअसल, यह पूरा विवाद हमें एक बड़े मुद्दे की ओर ले जाता है, कि क्या हम विकास को केवल ‘दिखावे’ के रूप में देख रहे हैं? क्या सोशल मीडिया की चमक-दमक ने वास्तविक समस्याओं को पीछे धकेल दिया है? यदि मेळघाट के बच्चे कुपोषण से जूझ रहे हैं, तो किसी भी ‘ट्रेंडिंग’ वीडियो से पहले उनकी थाली भरना अधिक जरूरी है।
सरकार को यह समझना होगा कि पर्यटन और विकास के प्रयास तब ही सार्थक होंगे जब वे बुनियादी जरूरतों के साथ संतुलन में हों। मेळघाट को दुनिया के सामने लाना जरूरी है, लेकिन उससे भी ज्यादा जरूरी है वहाँ के लोगों का जीवन स्तर सुधारना।
अंततः सवाल सीधा है – क्या हम ‘इन्फ्लुएंसर्स’ के जरिए मेळघाट की छवि चमकाना चाहते हैं, या वहाँ के लोगों का भविष्य? जवाब यदि दूसरा है, तो नीतियों की दिशा भी उसी के अनुरूप तय करनी होगी।
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