नई दिल्ली (भारत): भारत के उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को छत्तीसगढ़ राज्य के कुछ आदिवासी गांवों में ईसाई मिशनरियों और पादरियों के प्रवेश पर लगाए गए प्रतिबंधों को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी। न्यायलय ने कहा कि स्थानीय ग्राम सभाओं को ऐसे उपाय करने का पूरा अधिकार है।
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के उस निर्णय में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया, जिसमें गांव के प्रवेश द्वारों पर धर्म परिवर्तन की गतिविधियों के खिलाफ चेतावनी देने वाले पोस्टर लगाने को सही ठहराया गया था।
यह मामला राज्य के कांकेर जिले के आठ गांवों की ग्राम सभाओं द्वारा पारित प्रस्तावों से उत्पन्न हुआ था। इन गावों की आदिवासी परिषदों ने धार्मिक परिवर्तन को बढ़ावा देने वाले पादरियों और ईसाई कार्यकर्ताओं का प्रवेश वर्जित करनेवाले बड़े बोर्ड लगाए। इन बोर्डों को आदिवासी परंपराओं और सांस्कृतिक धरोहर के संरक्षण से जुड़े नारों के साध लगाया गया। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि ये उपाय भेदभाव के बराबर हैं और संविधान द्वारा दिए गए मूलभूत अधिकारों का उल्लंघन करते हैं, जिसमें धर्म की स्वतंत्रता और आवाजाही की स्वतंत्रता शामिल है।
याचिकाकर्ता दिगबल टंडी के वकील अधि. कॉलिन गोंसल्वेस ने उच्चतम न्यायालय में तर्क दिया कि उच्च न्यायालय के समक्ष पर्याप्त सामग्री नहीं थी। इसके बावजूद उच्च न्यायालय ने मिशनरी गतिविधियों के बारे में नकारात्मक टिप्पणी कीं। उन्होंने कहा कि उच्च न्यायालय में प्रस्तुत याचिका केवल पोस्टरों को हटाने पर केंद्रित थी और इसमें मिशनरी आचरण पर व्यापक टिप्पणी नहीं होनी चाहिए थी। याचिकाकर्ता ने प्रार्थना सभाओं में पादरियों पर कथित हमलों और आदिवासी परिवर्तित व्यक्तियों को उनके गांवों में दाह संस्कार अधिकार से वंचित किए जाने की चिंता का हवाला दिया।
छत्तीसगढ़ राज्य का प्रतिनिधित्व कर रहे प्रधान अधिवक्ता तुषार मेहता ने तर्क दिया कि उच्चतम न्यायालय के सामने किए जा रहे कई दावे उच्च न्यायालय में दाखिल मूल याचिका में नहीं थे। उन्होंने कहा कि उच्च न्यायालय की कार्यवाही पोस्टरों के विशेष मुद्दे तक सीमित थी और याचिकाकर्ताओं को समाधान के लिए संबंधित ग्राम सभाओं के पास जाने का निर्देश दिया गया था। उच्चतम न्यायालय ने राज्य के तर्क से सहमति व्यक्त की। न्यायालय ने कहा कि याचिका का दायरा सीमित था और स्थानीय निकायों के माध्यम से वैकल्पिक उपायों का उपयोग नहीं किया गया था।
उच्चतम न्यायालय ने कहा कि याचिकाकर्ताओं को पहले ग्राम सभा अधिकारियों से समाधान खोजने चाहिए जैसा कि उच्च न्यायालय ने कहा था।
उच्च न्यायालय के निर्णय में कहा गया था कि अवैध या जबरदस्ती धर्मांतरण के खिलाफ ग्रामीणों को चेतावनी देने के लिए पोस्टर लगाना अपने आप में असंवैधानिक नहीं माना जा सकता। न्यायालय ने यह स्वीकार किया कि भारतीय संविधान धर्म की स्वतंत्रता सहित अपने धर्म का प्रचार करने का अधिकार प्रदान करता है, लेकिन यह स्वतंत्रता अविचल नहीं है और सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य की सुरक्षा के लिए इस पर प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं।
उच्च न्यायालय के निर्णय ने यह भी कहा कि भारत में मिशनरी गतिविधियों की ऐतिहासिक जड़ें कि शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं जैसे सामाजिक उत्थान प्रयासों में हैं। लेकिन कुछ समूह समय के साथ अनुसूचित जनजातियों सहित आर्थिक और सामाजिक रूप से कमजोर वर्गों में कथित रूप से धर्मांतरण करने लगे। न्यायालय ने कहा कि जब ऐसी गतिविधियों मे प्रलोभन या कमजोरियों का शोषण शामिल होता है तब यह ”सांस्कृतिक जबरदस्ती” बन जाता है। इससे आदिवासी समुदायों में सामाजिक विभाजन और तनाव पैदा हो सकता है।
कुडाल, पारवी, जूनवानी, घोता, घोटिया, हबेचुर, मुसरपुट्टा और सुलागी जैसे गांवों की ग्राम सभाओं ने पंचायती (अनुसूचित क्षेत्रों में विस्तार) अधिनियम की धाराओं के तहत पोस्टरों को लगाया था। अधिनियम आदिवासी परिषदों को सामुदायिक संसाधनों और सांस्कृतिक संरक्षण पर विशेष अधिकार देता है। उच्च न्यायालय ने यह दावा खारिज कर दिया था कि पोस्टर अवैध भेदभाव के बराबर हैं। न्यायालय ने कहा कि यह पोस्टर धर्मांतरण को रोकने के लिए थे, न कि किसी व्यक्ति के धर्म के आधार पर आवाजाही या निवास को प्रतिबंधित करने के लिए।
उच्चतम न्यायालय द्वारा याचिका खारिज किये जाने से आदिवासियों के स्वशासन के अधिकार की पुष्टि हेती है।
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