Home World मूलनिवासी लोगों के लिए नई दोहरी लड़ाइयाँ: एआई उपनिवेशवाद और अवसंरचना न्याय

मूलनिवासी लोगों के लिए नई दोहरी लड़ाइयाँ: एआई उपनिवेशवाद और अवसंरचना न्याय

मूलनिवासी नेता कहते हैं कि यह प्रतिरूप में नया नहीं, बल्कि रूप में नया है

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प्रातिनिधिक चित्र।

लंदन (यूनाइटेड किंगडम): आदिवासी लोग पहले से ही अपनी भूमि, संसाधनों और जीवन के तरीकों की रक्षा के लिए लंबे समय से संघर्षों में लगे हुए हैं। अब आधुनिक अर्थव्यवस्था में वे दो नई चुनौतियों का सामना कर रहे हैं – डेटा उपनिवेशवाद और अवसंरचना न्याय। यह इसलिए कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता और डिजिटल अवसंरचना के विस्तार से विकास का स्थान और तरीका बदल रहा है। आदिवासी नेता कहते हैं कि यह प्रतिरूप (पैटर्न) में नया नहीं, बल्कि रूप में नया है।

दुनिया के कई क्षेत्रों में बड़े डेटा केंद्र, ऊर्जा कॉरिडोर और क्लाउड अवसंरचना केंद्र जैसे बड़े पैमाने के प्रौद्योगिकी परियोजनाएं तेजी से ग्रामीण और संसाधन-समृद्ध क्षेत्रों में बनाए जा रहे हैं। इन क्षेत्रों में आदिवासी और मूलनिवासी क्षेत्र भी शामिल हैं। आम तौर पर इन परियोजनाओं को निवेश और आधुनिकीकरण के प्रेरक के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, लेकिन आदिवासी नेता कहते हैं कि ये परियोजनाएं अक्सर सार्थक परामर्श, पर्याप्त पर्यावरणीय सुरक्षा उपायों या न्यायसंगत लाभ-साझाकरण के बिना आगे बढ़ते हैं।

इसके साथ ही आदिवासी विद्वानों और समर्थकों की बढ़ती संख्या डेटा उपनिवेशवाद (जिसे एआई उपनिवेशवाद भी कहा जाता है) के बारे में चेतावनी दे रहे है, जो कि आदिवासी ज्ञान, सांस्कृतिक सामग्री और यहाँ तक कि भाषा के डेटा का कृत्रिम बुद्धिमत्ता प्रणालियों कि जरिये बिना सहमति या संबंधित समुदायों की देखरेख के उपयोग और निष्कर्षण है। इसमें बड़े एआई प्रशिक्षण डेटासेट में आदिवासी भाषाओं का उपयोग बाहरी संस्थानों द्वारा सांस्कृतिक अभिलेखों का डिजिटलीकरण, और स्पष्ट शासन ढाँचों के बिना पारंपरिक पारिस्थितिक ज्ञान का वाणिज्यिक प्रणालियों में समावेश शामिल है।

एआई प्रणालियों को संचालित करने वाली भौतिक अवसंरचना पर्यावरणीय और सामाजिक तनावों का एक केंद्र बनती जा रही है। डेटा केंद्रों को विशाल मात्रा में बिजली और पानी की आवश्यकता होती है, और उनका स्थान अक्सर पर्यावरणीय बोझ को केंद्रित करता है। आदिवासी समुदायों का तर्क है कि यह गतिशीलता बाहरी निष्कर्षण के ऐतिहासिक पैटर्न को दर्शाती है, जहाँ लागत स्थानीय होती है जबकि लाभ कहीं और पहुंचते हैं।

ये विकास २१वीं सदी में संप्रभुता पर बहस को पुनः परिभाषित कर रहे हैं। यह मुद्दा अब केवल भूमि अधिकारों या प्राकृतिक संसाधनों तक सीमित नहीं है, बल्कि बढ़ते हुए डिजिटल प्रणालियों, संगणनात्मक अवसंरचना और उन पर निर्मित डेटा पारिस्थितिक तंत्रों तक विस्तृत हो रहा है। परिणामस्वरूप, आदिवासी आंदोलन पर्यावरण संरक्षण को डिजिटल अधिकारों से जोड़ना शुरू कर रहे हैं। उनका कहना है कि सार्थक संप्रभुता में अब भौतिक क्षेत्र और उस पर निर्भर तकनीकी प्रणालियों दोनों ही शामिल हैं।

मार्च २०२६ में संयुक्त राज्य अमेरिका के ओक्लाहोमा की सेमिनोल नेशन की जनजातीय परिषद ने सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव पारित कर उस क्षेत्र में डेटा केंद्र विकास को अवरुद्ध कर दिया। जनजातीय नेताओं ने पानी के उपयोग, पर्यावरणीय दबाव और प्रौद्योगिकी विकासकों के साथ प्रारंभिक चरण की वार्ताओं में पारदर्शिता की कमी को लेकर चिंताओं का हवाला दिया।

एआई अवसंरचना के भौतिक विस्तार ने पर्यावरणीय और आर्थिक न्याय की समस्याओं पर चिंता बढ़ा दी है। डेटा केंद्र को बहुत अधिक संसाधनों की आवश्यकता होती है और े बड़ी मात्रा में बिजली और पानी की खपत करते हैं। इन प्रोजेक्ट्स के पास रहने वाले समुदाय अक्सर दीर्घकालिक पर्यावरणीय समस्याओं का सामना करते हैं, जबकि उन्हें रोजगार जैसे अल्पकालिक लाभ लाभ मिलते हैं।

ऐसे में अवसंरचना न्याय और डिजिटल संप्रभुता अब एक दूसरे के लिए अविभाज्य बन गये हैं। और इसी ने आदिवासी कार्यकर्ताओं और विद्वानों को एक एकीकृत संघर्ष की रूपरेखा तैयार करने के लिए प्रेरित किया है। उनके अनुसार भूमि पर नियंत्रण को उस पर निर्मित डेटा प्रणालियों पर नियंत्रण से अलग नहीं किया जा सकता।

आदिवासी समुदायों का कहना है कि अवसंरचना न्याय और एआई उपनिवेशवाद के खिलाफ सुरक्षा के बिना डिजिटल अर्थव्यवस्था से पुराने औपनिवेशिक पैटर्न को एक तेज़, अधिक अदृश्य रूप में पुन: उत्पन्न करने का ख़तरा खड़ा हो जाता है और इसी लिए इसका विरोध करना आवश्यक है।

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