Home Asia “राज्य के पुनर्गठन के बाद अजजा को नहीं कर सकते वंचित”

“राज्य के पुनर्गठन के बाद अजजा को नहीं कर सकते वंचित”

पुनर्गठन के बाद मूल निवास का क्षेत्र दूसरे राज्य में जाए तो आदिवासियों को प्रवासी मानना गलत, कहा मुंबई उच्च न्यायालय ने

22
प्रातिनिधिक चित्र।

नागपुर (महाराष्ट्र, भारत): मुंबई उच्च न्यायालय के नागपुर पीठ ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि यदि किसी व्यक्ति के मूल निवास का हिस्सा पुर्गठन के चलते किसी दूसरे राज्य में चला गया है तो उस व्यक्ति को प्रवासी (migrant) मान कर उसे आरक्षण के लाभ से वंचित नहीं किया जा सकता।

न्यायमूर्ति मुकुलिका जवळकर और न्यायमूर्ति नंदेश देशपांडे ने प्रमाणपत्र जांच समिति के निर्णय को त्रुटिपूर्ण और कानून के खिलाफ बताया। न्यायालय ने कहा कि राज्यों का पुनर्गठन भाषा के आधार पर हुआ था, ना कि किसी जात या किसी जनजाति के आधार पर। यदि पुनर्गठन से पहले किसी व्यक्ति के समुदाय को उस क्षेत्र में अनुसूचित जनजाति के रूप में मान्यता प्राप्त थी और नवगठित राज्य में भी उस समुदाय को यह दर्जा प्राप्त है तो ऐसे व्यक्ति को केवल इस आधार पर आरक्षण के लाभ से वंचित नहीं किया जा सकता कि उसके मूल निवास का हिस्सा अब किसी अन्य राज्य में चला गया है। ऐसी स्थिति में याचिकाकर्ता को किसा दूसरे राज्य से आया हुआ प्रवासी नहीं माना जा सकता। न्यायालय ने जांच समिति के २३ फरवरी २०२२ के उस निर्मय को रद्द कर दिया जिस में याचिकाकर्ता वेदांत महेंद्र ठाकुर के गोंड जनजाति प्रमाणपत्र की वैधता को खारिज कर दिया था। न्यायलय ने संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया है कि वे आदेश प्राप्त होने के चार सप्ताह के अंदर वेदांत ठाकुर को जनजाति वैधता प्रमाणपत्र जारी करें।

वेदांत मुंबई स्थित महाराष्ट्र राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय का छात्र है। फरवरी २०२२ में उसके जनजाति प्रमाणपत्र को खारिज करते हुए जांच समिति ने तर्क दिया था कि वेदांत के पूर्वज मूल रूप से महाराष्ट्र के निवासी नहीं थे। इस लिए वह प्रवासी है और उसके दावे को स्वीकार नहीं किया जा सकता। इसके बाद वेदांत ने याचिका दाखिल की।

याचिकाकर्ता ने न्यायालय को बताया मेरे पूर्वज मध्य प्रदेश के सिवनी जिले के रहनेवाले थे। सन १९५० से पहले सिवनी जिला मध्य प्रांत एवं वर्‍हाड यानी Central Provinces and Berar (C. P. and Berar) का हिस्सा था और प्रशासनिक रूप से नागपुर संभाग के अंतर्गत आता था। सन १९६० में जब भाषा के आधार पर राज्य बने, तब मध्य प्रांत एवं वर्‍हाड का कुछ हिस्सा मध्य प्रदेश में चला गया तो कुछ हिस्सा महाराष्ट्र में। याचिकाकर्ता ने कहा कि गोंड समुदाय को महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश दोनों ही राज्यों में अनुसूचित जनजाति (अजजा) का दर्जा प्राप्त है। याचिककर्ता ने अपने दावे की पुष्टि के लिए अपने दादा रोशन सिंह तेज सिंह का सन १९४४ का स्कूल का रिकार्ड प्रस्तुत किया, जिसमें उनकी जाति राजगोंड दर्ज है। साथ ही उसने अपने पिता और चाचा के पुराने स्कूल रिकार्ड भी प्रस्तुत किए। पिताजी की जाति गोंड दर्ज है।

तुरंत अपडेट प्राप्त करने के लिए यहाँ क्लिक करें और हमारे WhatsApp चैनल को फॉलो करें।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here