झाबुआ (मध्य प्रदेश, भारत) मध्य प्रदेश के झाबुआ जिले की पहाड़ियों में भील आदिवासी समुदाय अपनी सदियों पुरानी ‘पाट’ सिंचाई तकनीक को बचाने की लड़ाई लड़ रहा है। स्थानीय लोगों का कहना है कि सरकारी बांध परियोजनाएं उनकी पारंपरिक जल व्यवस्था और आजीविका दोनों के लिए खतरा बनती जा रही हैं।
‘पाट’ प्रणाली के तहत पहाड़ी नालों का पानी पत्थर, मिट्टी और स्थानीय ज्ञान से तैयार संकरे रास्तों के जरिए खेतों तक पहुंचाया जाता है। इस अचंभित करने वाली तकनीक से पानी पहाड़ी पर चढ़ता हुआ दिखता है। भील आदिवासियों ने इस जगह की विशेष बनावट को देखते हुए यह तकनीक विकसित की है और यह स्पष्ट रूप से गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत को उलट देती है। इस प्रणाली के अंतर्गत पहाड़ी से नीचे बहते हुए पानी को खास तरह से सिंचाई-नालों की तरफ मोड़ दिया जाता है, जिन्हें पाट कहा जाता है। पहले धारा के प्रतिकूल दिशा में बांध बनाते हैं। फिर पत्थरों से पाट तैयार किया जाता है। इन बांधों से मुड़कर पानी पाट में आता है और नदी के तल से ऊंचे खेतों को भी सींचने में सफलता मिलती है।
विंध्य और सतपुड़ा के भील, जो नर्मदा के किनारे रहते हैं, पारंपरिक रूप से टिककर खेती नहीं करते थे। सन 1956 में झाबुआ, धार और खरगोन मध्य प्रदेश राज्य में शामिल हुए। मध्य प्रदेश सरकार ने जगह बदल-बदल कर और जंगल जलाकर की जाने वाली खेती पर रोक लगा दी और भीलों को स्थायी रूप से उनकी जमीन पर, जहां वे खेती किया करते थे, बसाया। वनों की देखरेख का कार्यभार वन विभाग को सौंप दिया गया। बाद में, वन विभाग ने वनों का व्यावसायिक दोहन शुरू कर दिया।
इन सभी नीतियों का जनजातियों पर बहुत बुरा असर पड़ा। तीखी ढलान वाली जमीन पर जबरन बसने, खेतों से खराब उपज, वनों के विनाश और खेती के वाणिज्यीकरण से उनकी आर्थिक जिंदगी बिगड़ गई। ऐसे हालात से भीलों को उपज बढ़ाने के लिए अलग तरह के उपायों पर सोचने को मजबूर किया होगा। लेकिन किसने सिंचाई पहली बार शुरू की, यह कोई ठीक से नहीं जानता।
ऐसा माना जा सकता है कि यह खोज किसी सांयोगिक घटना पर चिंतन-विश्लेषण का परिणाम है। बाकी का काम नई कठिन परिस्थिति के दबाव ने किया होगा। सबसे रहस्यमयी बात यह है कि भीलों ने, बिना किसी सर्वेक्षण के उपकरणों की सहायता से, सही-सही उस स्थान को चुना जहां पानी की दिशा मोड़ने वाले बांध को बनाना सबसे उपयोगी है। भील अपनी इस कला को अन्य कलाओं की तरह भगवान की देन मानते हैं।
कठिन और पथरीले इलाकों में विकसित इस तकनीक ने भिटाडा जैसे गांवों की बंजर जमीन को उपजाऊ खेतों में बदल दिया है, जहां मक्का, कपास और चना जैसी फसलें उगाई जाती हैं। हर साल खरीफ फसल के बाद ग्रामीण सामूहिक रूप से नहरों और जल मोड़ संरचनाओं की मरम्मत करते हैं। पूरी व्यवस्था समुदाय के सहयोग और साझा श्रम पर आधारित है, जिसे स्थानीय लोग अपनी जल सुरक्षा की रीढ़ मानते हैं। स्थानीय समुदाय का दावा है कि कई सरकारी परियोजनाएं वनों की कटाई, गाद जमने, बिजली संकट और रखरखाव की समस्याओं के कारण अपेक्षित परिणाम नहीं दे सकीं, जबकि पारंपरिक व्यवस्था कम लागत में लगातार काम करती रही।
नर्मदा घाटी में सरदार सरोवर बांध जैसी परियोजनाओं को लेकर भी चिंता बढ़ रही है। ग्रामीणों को डर है कि जल प्रवाह में बदलाव और संभावित डूब क्षेत्र उनकी सदियों पुरानी सिंचाई प्रणाली को हमेशा के लिए खत्म कर सकते हैं। भील समुदाय के लिए यह संघर्ष केवल पानी का नहीं, बल्कि जल, जंगल, जमीन और अपनी पारंपरिक पहचान को बचाने की लड़ाई बन चुका है।
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