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खुली हवा में सांस लेने के लिए कुछ तो जगह छोड़िए

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राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (NGT) ने  ८०,००० करोड़ रुपये की लागत वाली ग्रेट निकोबार परियोजना को मंजूरी दे दी है। प्राधिकरण ने अपने निर्णय में कहा कि इस परियोजना में हस्तक्षेप करने का कोई ठोस आधार नहीं पाया गया। इस महत्वाकांक्षी परियोजना में एक अंतरराष्ट्रीय कंटेनर ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल, एक अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा, एक विद्युत संयंत्र तथा १६६.१० वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में विकसित की जाने वाली टाउनशिप शामिल है। उल्लेखनीय है कि इसमें से १३०.७५ वर्ग किलोमीटर वनभूमि है और ८४.१० वर्ग किलोमीटर क्षेत्र आदिवासी क्षेत्र के अंतर्गत आता है।

किसी परियोजना को कानूनी मंजूरी मिलना एक प्रक्रिया है, लेकिन उससे जुड़े सामाजिक, पर्यावरणीय और मानवीय प्रश्न समाप्त नहीं हो जाते। विकास की इस परिकल्पना के साथ एक बड़ा सवाल खड़ा है — क्या आधुनिक ढांचागत विकास की कीमत जंगलों और आदिवासी समुदायों को चुकानी पड़ेगी?

जिन वन क्षेत्रों ने सदियों से प्रकृति का संतुलन बनाए रखा, वही आज बड़े प्रकल्पों के कारण प्रभावित होने की आशंका में हैं। जिन आदिवासी समुदायों ने प्रकृति के साथ सहअस्तित्व का जीवन जिया, उनकी जमीनें विकास की योजनाओं में शामिल की जा रही हैं। यह केवल भूमि का प्रश्न नहीं है, बल्कि अस्तित्व, संस्कृति और पहचान का भी सवाल है।

दुनियाभर में यह प्रवृत्ति देखी गई है कि विकास और कॉरपोरेट विस्तार के नाम पर मूलनिवासी समुदायों की भूमि छीन ली जाती रही है। इसे कानूनी भूमि अधिग्रहण का नाम दिया जाता है, लेकिन सच तो यह है कि इस पर बसनेवाले आदिवासी और मूलनिवासी समूह विस्थापित हो जाते हैे। अमेरिका से लेकर एशिया और अफ्रीका तक इतिहास इस बात का साक्षी है कि विकास की दौड़ में सबसे अधिक प्रभावित वही समुदाय हुए हैं, जो पहले से ही हाशिए पर थे। प्रगति की चमक के पीछे अक्सर उनकी पीड़ा दब जाती है।

यह कहना उचित नहीं होगा कि विकास की आवश्यकता नहीं है। देश को बंदरगाह, हवाई अड्डे और आधुनिक सुविधाएं चाहिए। परंतु प्रश्न यह है कि विकास का मॉडल क्या हो? विकास की प्रक्रिया में क्या पर्यावरणीय संतुलन को ध्यान में नहीं रखा जाना चाहिए? क्या उसमें स्थानीय और आदिवासी समुदायों की सहमति और भागीदारी सुनिश्चित होती है? क्या उनके अधिकारों और आजीविका की सुरक्षा की ठोस व्यवस्था है? और सबसे अहम सवाय यह है कि कोई परियोजना क्या वाकई में आवश्यक है?

यदि जंगल समाप्त होंगे तो केवल पेड़ ही नहीं कटेंगे, बल्कि जलवायु, जैव विविधता और भविष्य की पीढ़ियों का संतुलन भी प्रभावित होगा। यदि आदिवासी विस्थापित होंगे तो केवल घर नहीं उजड़ेंगे, बल्कि एक संपूर्ण जीवन पद्धति और सांस्कृतिक विरासत खतरे में पड़ जाएगी।

आज आवश्यकता इस बात की है कि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन स्थापित किया जाए। सामान्य नागरिकों और आदिवासियों — दोनों को खुली हवा में सांस लेने का अधिकार है। विकास ऐसा हो जो समावेशी हो, न्यायपूर्ण हो और प्रकृति के साथ सामंजस्य स्थापित करे।

देश की प्रगति महत्वपूर्ण है, लेकिन उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है मानवीय संवेदना और प्राकृतिक संतुलन। विकास की अंधी दौड़ में आदिवासियों की बलि देकर आगे बढ़ना किसी भी सभ्य समाज के लिए उचित नहीं कहा जा सकता। अब समय आ गया है कि हम यह सुनिश्चित करें कि खुली हवा में सांस लेने के लिए कुछ तो जगह बचे।

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