भारत के आदिवासी क्षेत्रों में महिलाएँ अधिकतर खेती करने वाली, संग्राहक और पारंपरिक ज्ञान की संरक्षक के रूप में सामुदायिक जीवन में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभती रही हैं। लेकिन पैतृक संपत्ति विरासत में पाने का उनका अधिकार ऐतिहासिक रूप से अस्थिर और असमान रहा है। अन्य भारतीय महिलाओं के विपरीत, अनुसूचित जनजातियों से आने वाली महिलाएँ मुख्यधारा के उत्तराधिकार कानूनों जैसे हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम के दायरे से बाहर रहती हैं। इसके कारण संपत्ति के मामलों का निपटारा प्रथागत परंपराओं के मिश्रित ढाँचे के अंतर्गत किया जाता है, जिनमें से अनेक ने पुरुष उत्तराधिकारियों को प्राथमिकता दी है। जुलाई २०२५ में उच्चतम न्यायालय के एक ऐतिहासिक निर्णय दिया कि किसी आदिवासी महिला को स्पष्ट, विधिक रूप से मान्य प्रथा के बिना पारिवारिक संपत्ति में उसके वैध हिस्से से वंचित करना संवैधानिक समानता का उल्लंघन है। इस निर्णय के बावजूद आदिवासी महिलाओं को पैतृक संपत्ति में हिस्सा मिलने की राह कठिन है। अब वास्तविक परीक्षा इस बात में निहित है कि क्या कानूनी जीतें भारत भर के गाँवों, जंगलों और पहाड़ियों में स्थायी परिवर्तन में बदलती हैं।
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