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इंडोनेशिया में आदिवासी समुदायों ने एक दशक में 1.17 करोड़ हेक्टेयर भूमि खोई

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प्रातिनिधिक चित्र

जकार्ता (इंडोनेशिया): इंडोनेशिया भर में आदिवासी समुदायों ने बीते एक दशक में 1.17 करोड़ हेक्टेयर से अधिक परंपरागत भूमि खो दी है, क्योंकि औद्योगिक और खनन गतिविधियां तेजी से उनके पुश्तैनी इलाकों में फैलती जा रही हैं। यह बात इस सप्ताह जारी एक रिपोर्ट में कही गई, जिसे इंडोनेशिया के आदिवासी गठबंधन अमन, ग्लोबल अलायंस ऑफ टेरिटोरियल कम्युनिटीज और सहयोगी संगठनों ने तैयार किया है। रिपोर्ट में खनन, लकड़ी कटाई, तेल और गैस, भू-तापीय परियोजनाओं और अन्य व्यावसायिक गतिविधियों से जुड़े लगभग 700 भूमि संघर्ष दर्ज किए गए, जिनके कारण समुदायों का विस्थापन हुआ और पारंपरिक भूमि अधिकार कमजोर पड़े।

आदिवासी परंपरागत भूमि, जिसे स्थानीय रूप से “आदत” क्षेत्र कहा जाता है, सांस्कृतिक पहचान, आजीविका और पारिस्थितिक संरक्षण की आधारशिला है। इंडोनेशिया की अनुमानित 18 से 26 प्रतिशत आबादी आदिवासी समुदायों से जुड़ी है और करोड़ों लोग जंगलों और तटीय क्षेत्रों में रहते हैं। लगभग 3.36 करोड़ हेक्टेयर में फैली ये भूमि जैव विविधता संरक्षण, कार्बन भंडारण और खाद्य सुरक्षा के लिए अहम मानी जाती है, लेकिन अधिकार समूहों का कहना है कि इन क्षेत्रों को कानूनी मान्यता बहुत सीमित और धीमी गति से मिल रही है।

रिपोर्ट के अनुसार, सरकारी आंकड़े दर्शाते हैं कि 2.5 करोड़ हेक्टेयर से अधिक आदिवासी क्षेत्रों में से एक प्रतिशत से भी कम भूमि को औपचारिक कानूनी मान्यता मिली है। इसका परिणाम यह है कि अधिकांश इलाकों पर व्यावसायिक पट्टे जारी कर दिए गए हैं। ताड़ तेल, वानिकी और खनन कंपनियां अब करोड़ों हेक्टेयर भूमि पर काम कर रही हैं, जिनका आदिवासी इलाकों से टकराव बढ़ रहा है और भूमि अधिकारों को लेकर संघर्ष गहराता जा रहा है।

अधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि यह स्थिति ऐतिहासिक कारणों से बनी है। औपनिवेशिक और स्वतंत्रता के बाद के कानूनी ढांचे के तहत बड़े पैमाने पर जंगलों को राज्य की भूमि घोषित कर दिया गया, जिससे पारंपरिक आदत व्यवस्थाओं को दरकिनार कर दिया गया। इसके चलते सरकार को बिना सार्थक परामर्श के व्यावसायिक पट्टे देने की शक्ति मिल गई। हालांकि 2013 में संवैधानिक न्यायालय ने आदिवासी समुदायों के परंपरागत जंगलों पर अधिकार को मान्यता दी थी, लेकिन समुदायों का कहना है कि इसे लागू करने की प्रक्रिया जटिल, महंगी और शक्तिशाली कारोबारी हितों के पक्ष में झुकी हुई है।

रिपोर्ट में हलमहेरा के ओ’होंगाना मन्यावा समुदाय का उदाहरण दिया गया है, जो एक घुमंतू वनवासी समूह है। उनके पुश्तैनी क्षेत्र पर 19 कंपनियों के पास मौजूद 65,000 हेक्टेयर से अधिक खनन पट्टों का अतिक्रमण है। समुदाय के सदस्यों को नियमित निगरानी और विरोध करना पड़ रहा है। इसके अलावा ताड़ तेल बागानों के विस्तार से जुड़े संघर्षों का भी उल्लेख किया गया है। देश में लगभग 1.4 करोड़ हेक्टेयर में फैले ताड़ तेल बागान वनों की कटाई, आजीविका के नुकसान और सांस्कृतिक विघटन से जोड़े गए हैं।

यह रिपोर्ट इंडोनेशिया में भूमि उपयोग और प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन को लेकर बढ़ते तनाव के बीच सामने आई है। सरकार ने अवैध खनन और बागानों पर कार्रवाई करते हुए लाखों हेक्टेयर भूमि जब्त की है और संरक्षित वनों में अवैध रूप से काम करने वाली कंपनियों पर जुर्माना लगाया है। हालांकि समुदायों का कहना है कि इन कदमों से अक्सर छोटे स्थानीय किसानों को नुकसान होता है, जबकि आदिवासी भूमि अधिकारों की मूल समस्या जस की तस बनी रहती है।

2025 में आदिवासी भूमि अधिकारों की कानूनी मान्यता के मामले में प्रगति सीमित रही है। अंतरराष्ट्रीय जलवायु सम्मेलनों में किए गए सरकारी वादों के बावजूद केवल कुछ ही परंपरागत वनों को औपचारिक मान्यता मिल पाई है। आलोचकों का कहना है कि रुका हुआ कानून और परस्पर विरोधी नीतियां राष्ट्रीय योजना और जलवायु रणनीतियों में आदिवासी आवाजों को हाशिए पर डाल रही हैं, जबकि उनके क्षेत्र वनों की कटाई रोकने और उत्सर्जन घटाने में अहम भूमिका निभाते हैं।

कुछ क्षेत्रों में समुदायों ने सहभागी मानचित्रण और कानूनी लड़ाइयों के जरिए आंशिक सफलताएं हासिल की हैं। फ्लोरेस द्वीप पर गेंडंग न्गकियोंग समुदाय को 892 हेक्टेयर भूमि की मान्यता मिली, जबकि उत्तरी सुमात्रा में ओम्पु उम्बक सियालागन समुदाय को पल्प कंपनियों से लंबे संघर्ष के बाद कानूनी मान्यता प्राप्त हुई। अधिकार समूह इन उदाहरणों को समुदाय-नेतृत्व वाली भूमि मान्यता को व्यापक स्तर पर लागू करने के मॉडल के रूप में देखते हैं।

आदिवासी नेता सरकार से मजबूत सुरक्षा उपाय अपनाने की मांग कर रहे हैं, जिनमें आदिवासी क्षेत्रों को प्रभावित करने वाली सभी परियोजनाओं के लिए मुक्त, पूर्व और सूचित सहमति को कानूनी रूप देना और व्यापक आदिवासी अधिकार कानून को तेजी से पारित करना शामिल है। उनका कहना है कि सांस्कृतिक विरासत की रक्षा, वनों के संरक्षण और इंडोनेशिया के जलवायु तथा विकास लक्ष्यों को हासिल करने के लिए आदिवासी भूमि अधिकारों की पूर्ण मान्यता और वित्तीय समर्थन आवश्यक है।

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