Home Latin America ब्राज़ील में आदिवासी समुदाय का भूमि अधिकारों के लिए संघर्ष तेज

ब्राज़ील में आदिवासी समुदाय का भूमि अधिकारों के लिए संघर्ष तेज

37
प्रातिनिधिक चित्र

ब्रासीलिया (ब्राज़ील): ब्राज़ील भर के आदिवासी समुदाय अपने पुश्तैनी इलाकों की कानूनी मान्यता और संरक्षण की मांग को लेकर संघर्ष तेज कर रहे हैं, क्योंकि राजनीतिक और कानूनी चुनौतियां लगातार बढ़ रही हैं। अधिकार समूहों का कहना है कि यह आंदोलन भूमि सीमांकन से जुड़े लंबे विवादों, गैर-आदिवासी कब्जाधारियों के हिंसक विरोध और संसद में उठाए गए उन कदमों के खिलाफ है, जो आदिवासी नेताओं के अनुसार संवैधानिक सुरक्षा को कमजोर कर सकते हैं।

इस आंदोलन का तात्कालिक केंद्र अलागोआस राज्य के पाल्मेरा दोस इंडियोस क्षेत्र में रहने वाले शुकुरु-करिरी समुदाय की भूमि है। वर्ष 2013 में इस क्षेत्र का भौतिक सीमांकन हो चुका था, लेकिन अब तक संघीय सरकार द्वारा इसका औपचारिक अनुमोदन नहीं किया गया है। इसके कारण यह इलाका अतिक्रमण और टकराव के प्रति असुरक्षित बना हुआ है। आदिवासी संगठनों और उनके सहयोगियों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अभियान शुरू कर सीमांकन प्रक्रिया पूरी करने, गैर-आदिवासी कब्जाधारियों को हटाने और छोटे किसानों के लिए मुआवजा या पुनर्वास की मांग की है।

ब्राज़ील के 1988 के संविधान में आदिवासी भूमि अधिकारों को मान्यता दी गई है और यह स्वीकार किया गया है कि आदिवासी समुदायों का उन भूमियों पर पैतृक अधिकार है, जिन पर वे परंपरागत रूप से रहते आए हैं। इसके बावजूद यह बहस जारी है कि इन अधिकारों को कैसे लागू किया जाए। “टेम्पोरल फ्रेमवर्क” नामक एक विवादास्पद कानूनी सिद्धांत के तहत यह तर्क दिया गया कि केवल वही भूमि आदिवासी अधिकार में आएगी, जिस पर वे 1988 में संविधान लागू होने के समय मौजूद थे। सुप्रीम फेडरल कोर्ट ने 2023 में इस सिद्धांत को खारिज कर दिया और कहा कि भूमि अधिकार ऐतिहासिक कब्जे पर आधारित हैं, न कि किसी तय तारीख पर।

अदालत के इस फैसले के बावजूद, इस वर्ष संसद ने एक ऐसा कानून और बाद में एक प्रस्तावित संवैधानिक संशोधन पारित किया, जिसका उद्देश्य टेम्पोरल फ्रेमवर्क को संवैधानिक रूप देना है। आदिवासी नेताओं और नागरिक समाज का कहना है कि यदि इसे संविधान में शामिल किया गया तो अदालत के फैसले का प्रभाव खत्म हो जाएगा और कृषि-व्यवसाय तथा खनन हितों के लिए आदिवासी भूमि पर अतिक्रमण का रास्ता खुल जाएगा।

सुप्रीम फेडरल कोर्ट इस कानून की संवैधानिकता की समीक्षा कर रहा है और सुनवाई में आदिवासी संगठनों ने सक्रिय भागीदारी की है। अदालत में दी गई गवाहियों में भूमि विवादों से जुड़ी हिंसा, धमकियों और हमलों को रेखांकित किया गया है, जिनका सामना आदिवासी समुदायों को करना पड़ा है।

यह संघर्ष ब्राज़ील में व्यापक भूमि विवादों की पृष्ठभूमि में चल रहा है। माटो ग्रोसो दो सुल राज्य में गुआरानी-कायोवा समुदायों ने “रेटोमादास” के तहत उन इलाकों पर दोबारा कब्जा किया है, जिन्हें राज्य ने मान्यता तो दी है लेकिन अब तक पूरी तरह सीमांकित नहीं किया गया। इन कार्रवाइयों के दौरान स्थानीय किसानों, निजी सुरक्षा बलों और कभी-कभी पुलिस के साथ झड़पें हुई हैं।

इन टकरावों में आदिवासियों के खिलाफ हिंसा ने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय चिंता बढ़ाई है। अमेज़न क्षेत्र में कावाहीवा जैसे एकांतवासियों और संपर्क-विहीन समुदायों को अवैध लकड़ी कटाई और पशुपालन से गंभीर खतरा बना हुआ है, जबकि नौकरशाही और राजनीतिक अड़चनों के कारण उनकी भूमि का सीमांकन रुका हुआ है।

आदिवासी नेता भूमि अधिकारों को पर्यावरण और जलवायु मुद्दों से भी जोड़कर देखते हैं। परंपरागत आदिवासी क्षेत्र अमेज़न वर्षावन के बड़े हिस्से में फैले हैं, जो कार्बन भंडारण, जैव विविधता और जलवायु संतुलन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। इसी कारण हजारों आदिवासियों ने राजधानी में प्रदर्शन कर भूमि सीमांकन को मानवाधिकार के साथ-साथ जलवायु मुद्दा बताया।

2025 के अंत में सरकार ने अमेज़न में कुछ नई आदिवासी भूमियों के सीमांकन की घोषणा की, लेकिन अधिकार समूहों का कहना है कि यह प्रगति लंबित दावों की तुलना में बहुत कम है। आदिवासी संगठन मुक्त, पूर्व और सूचित सहमति को कानूनी रूप देने, अवैध अतिक्रमण के खिलाफ कड़े प्रवर्तन और सीमांकित भूमियों के शीघ्र अनुमोदन की मांग जारी रखे हुए हैं।

सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला और संविधान में प्रस्तावित बदलावों को लेकर जारी राजनीतिक संघर्ष ब्राज़ील में आदिवासी भूमि अधिकारों के भविष्य को तय करेगा, जिसका असर आदिवासी स्वायत्तता और दुनिया के सबसे बड़े उष्णकटिबंधीय वर्षावन के संरक्षण पर भी पड़ेगा।

तुरंत अपडेट प्राप्त करने के लिए यहाँ क्लिक करें और हमारे WhatsApp चैनल को फॉलो करें।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here