भुवनेश्वर (उडिशा, भारत) उडिशा के देब्रीगढ़ वन्यजीव अभयारण्य ने अपनी पहली सर्व-महिला एंटी-पोचिंग स्क्वाड तैनात की है, जिससे स्थानीय संरक्षण प्रवर्तन में महत्वपूर्ण बदलाव आया है और आसपास के समुदायों की महिलाओं को वन्यजीव सुरक्षा की अग्रिम पंक्ति में शामिल किया गया है। विशेष बात यह है कि पांच सदस्यीय इस इकाई में चार महिलाएं आदिवासी परिवारों से हैं। यह आदिवासी महिलाएं संरक्षित वन क्षेत्र के आसपास बसे गांवों से आती हैं, और यह बात संरक्षण में आदिवासी महिलाओं की बढ़ती भूमिका को रेखांकित करता है।
स्क्वाड की सदस्याओं ने लगभग तीन महीने का गहन प्रशिक्षण पूरा किया, जिसमें जंगल ट्रैकिंग, वन गश्त, कैमरा ट्रैप का उपयोग, मोबाइल-आधारित पेट्रोलिंग ऐप्स, आत्मरक्षा तथा वीएचएफ रेडियो और वॉकी-टॉकी जैसे संचार उपकरणों का संचालन शामिल था। इनमें से दो महिला कर्मियों कुशल तैराक भी हैं, और उन्हे जलाशयों में गश्त और क्रूज़ संचालन के लिए विशेष प्रशिक्षण भी दिया गया है। इस टीम को अभयारण्य में तैनात लगभग 150 प्रवर्तन कर्मियों की टीम में शामिल किया गया।
अधिकारियों के अनुसार इस पहल का उद्देश्य शिकार और अन्य अवैध गतिविधियों पर निगरानी मजबूत करना है, साथ ही वन संरक्षण में लैंगिक समावेशन और सामुदायिक सहभागिता को बढ़ावा देना भी है। हीराकुंड वन्यजीव प्रभाग के अंतर्गत आने वाला देब्रीगढ़ अभयारण्य हिरण, सांभर, गौर सहित कई प्रजातियों का आवास है और ग्रामीण बस्तियों से सटा होने के कारण यहां मानव-वन्यजीव संपर्क आम है।
स्क्वाड में चुनी गई चार महिलाएं ऐसे आदिवासी परिवारों से आती हैं जिनकी आजीविका परंपरागत रूप से वन संसाधनों पर निर्भर रही है और जिन्हें इलाके की भौगोलिक बनावट तथा मौसमी परिस्थितियों की अच्छी जानकारी है। अधिकारियों का कहना है कि उनकी भागीदारी से संरक्षण एजेंसियों और स्थानीय निवासियों के बीच भरोसा बढ़ेगा, क्योंकि कई गांवों में भूमि उपयोग, फसल क्षति और मानव-वन्यजीव संघर्ष को लेकर लंबे समय से तनाव रहा है।
यह सर्व-महिला इकाई भारत में वन्यजीव संरक्षण एजेंसियों द्वारा पुरुष-प्रधान क्षेत्रों में महिलाओं को सशक्त करने के व्यापक प्रयासों का हिस्सा है। वन विभाग के अधिकारियों का कहना है कि महिलाएं गश्त और सूचना संकलन के दौरान सामुदायिक स्तर पर अधिक स्वीकार्यता और संवेदनशीलता ला सकती हैं। आदिवासी महिलाओं को विशेष रूप से औपचारिक संरक्षण तंत्र और वन संबंधी पारंपरिक ज्ञान के बीच सेतु के रूप में देखा जा रहा है।
ओडिशा में आदिवासी समुदायों और संरक्षित क्षेत्रों के बीच संबंध दशकों से जटिल रहे हैं, जहां परंपरागत जीवन-पद्धतियों और बदलते संरक्षण नियमों के बीच संतुलन की जरूरत रही है। देब्रीगढ़ जैसे अभयारण्य टिकाऊ आजीविका, जैव विविधता संरक्षण और सामुदायिक अधिकारों पर विमर्श के केंद्र बनते जा रहे हैं। प्रवर्तन भूमिकाओं में आदिवासी महिलाओं की भागीदारी को वनों और वन्यजीवों की सुरक्षा में उनकी हिस्सेदारी की मान्यता के रूप में देखा जा रहा है।
इस पहल के समर्थकों का कहना है कि यह मॉडल अन्य अभयारण्यों के लिए भी उदाहरण बन सकता है, जहां अवैध शिकार और संसाधनों के दोहन पर अंकुश लगाने के लिए सामुदायिक सहयोग आवश्यक है। उनका मानना है कि आदिवासी महिलाओं की भागीदारी से अवैध गतिविधियों की निगरानी और सूचना साझा करने में सुधार होगा, साथ ही ग्रामीण इलाकों में महिलाओं के लिए आर्थिक स्वतंत्रता और नेतृत्व के अवसर भी बढ़ेंगे।
यह कदम राज्य सरकार की उस व्यापक योजना के अनुरूप है, जिसके तहत देब्रीगढ़ को एक वैश्विक ईको-टूरिज्म गंतव्य के रूप में विकसित किया जाना है। अधिकारियों का कहना है कि इससे संरक्षण, स्थानीय विकास और प्राकृतिक विरासत की सामुदायिक देखरेख के बीच बेहतर समन्वय स्थापित हो सकेगा।
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