Home World वनों की रक्षा करते हैं आदिवासी क्षेत्र, लेकिन औद्योगिकीकरण का संकट बरकरार

वनों की रक्षा करते हैं आदिवासी क्षेत्र, लेकिन औद्योगिकीकरण का संकट बरकरार

ग्लोबल अलायंस ऑफ टेरिटोरियल कम्युनिटीज की रिपोर्ट में खुलासा

24
प्रातिनिधिक चित्र

न्यू यॉर्क (संयुक्त राज्य अमेरिका): दुनिया भर के आदिवासी क्षेत्रों में पृथ्वी के सबसे सुरक्षित और अक्षुण्ण वनों का बड़ा हिस्सा मौजूद है, लेकिन तेल, गैस, खनन और लकड़ी कटाई से जुड़ी रियायतों के कारण इन जमीनों के लाखों हेक्टेयर हिस्से पर बढ़ता संकट मंडरा रहा है। अंतरराष्ट्रीय जलवायु वार्ताओं के दौरान जारी एक वैश्विक आकलन में यह बात सामने आई है। निष्कर्ष यह स्पष्ट करते हैं कि आदिवासी प्रबंधन वाले क्षेत्रों, जहां वनों की कटाई लगातार कम रही है, और औद्योगिक दोहन के लिए खोले गए पड़ोसी इलाकों के बीच गहरा अंतर है।

आदिवासी लोग और स्थानीय समुदाय वैश्विक आबादी का पांच प्रतिशत से भी कम हिस्सा हैं, लेकिन दुनिया भर में लगभग एक अरब हेक्टेयर वन भूमि की देखरेख करते हैं। इन क्षेत्रों में पृथ्वी के शेष बचे अक्षुण्ण वनों का आधे से अधिक हिस्सा और वैश्विक जैव-विविधता हॉटस्पॉट्स का लगभग ४३ प्रतिशत शामिल है। ये क्षेत्र जलवायु परिवर्तन की गति को धीमा करने के लिए आवश्यक विशाल कार्बन भंडार भी संजोए हुए हैं। इसके बावजूद, सरकारें आर्थिक विकास और ऊर्जा संक्रमण के नाम पर आदिवासी भूमि के बड़े हिस्से को लगातार उत्खनन उद्योगों के लिए आवंटित करती जा रही हैं। यह निष्कर्ष ग्लोबल अलायंस ऑफ टेरिटोरियल कम्युनिटीज द्वारा जारी हालिया रिपोर्ट “इंडिजिनस टेरिटरीज एंड लोकल कम्युनिटीज ऑन द फ्रंटलाइंस” में सामने आया है।

अमेज़न बेसिन में ही लगभग ३.१ करोड़ हेक्टेयर आदिवासी भूमि पर तेल और गैस की रियायतें लागू हैं, जबकि खनन रियायतें अतिरिक्त ९.८ लाख हेक्टेयर क्षेत्र को कवर करती हैं। कांगो बेसिन में लगभग ३८ प्रतिशत सामुदायिक वन भूमि तेल और गैस ब्लॉकों से प्रभावित है, जिनमें कार्बन-समृद्ध पीटलैंड क्षेत्र भी शामिल हैं, जो वैश्विक उत्सर्जन को नियंत्रित करने में अहम भूमिका निभाते हैं। इंडोनेशिया में भी इसी तरह का दबाव है, जहां लगभग १८ प्रतिशत आदिवासी भूमि लकड़ी कटाई की रियायतों से आच्छादित है। वहीं मेसोअमेरिका में लगभग १.९ करोड़ हेक्टेयर, यानी आदिवासी क्षेत्रों का करीब १७ प्रतिशत हिस्सा, खनन और उससे जुड़ी उत्खनन गतिविधियों के दावों के तहत आता है।

इन दबावों का गंभीर मानवीय असर भी सामने आया है। २०१२ से २०२४ के बीच, आकलन में शामिल देशों में कम से कम १,६९२ पर्यावरण और भूमि रक्षकों की हत्या हुई या वे लापता हो गए। इनमें से २०८ मामले खनन और तेल विकास जैसी उत्खनन गतिविधियों से जुड़े थे, जबकि १३१ मामलों का संबंध लकड़ी कटाई से था। आदिवासी नेता इस स्थिति को एक विडंबना बताते हैं, जहां वैश्विक महत्व के वनों की रक्षा करने वाले समुदायों को सबसे अधिक हिंसा का सामना करना पड़ता है।

इसी के साथ रिपोर्ट ऐसे ठोस उदाहरण भी पेश करती है, जहां आदिवासी शासन प्रणालियों ने मजबूत संरक्षण परिणाम दिए हैं। ग्वाटेमाला के माया बायोस्फियर रिज़र्व में आदिवासी और सामुदायिक प्रबंधन वाली वन रियायतों में २०१४ से २०२४ के बीच केवल १.५ प्रतिशत वन क्षति दर्ज की गई। इसके विपरीत, राज्य या निजी हितों द्वारा प्रबंधित आसपास के क्षेत्रों में इसी अवधि में लगभग ११ प्रतिशत वन हानि हुई। कोलंबिया में २५ आधिकारिक रूप से मान्यता प्राप्त आदिवासी क्षेत्रीय इकाइयों ने देश के अन्य हिस्सों में बढ़ती वनों की कटाई के बावजूद अपने ९९ प्रतिशत से अधिक वन क्षेत्र को सुरक्षित रखा है।

अन्य उदाहरण औद्योगिक विस्तार के खिलाफ जारी प्रतिरोध को रेखांकित करते हैं। इंडोनेशिया में ओ’होंगाना मान्यावा समुदाय अपनी पैतृक भूमि पर निकल खनन परियोजनाओं का लगातार विरोध कर रहा है, उनका कहना है कि इससे वनों, जल स्रोतों और सांस्कृतिक अस्तित्व को खतरा है। पनामा में गुना समुदाय ने स्वायत्त शासन, संरक्षण और छोटे पैमाने के पर्यटन को जोड़कर तटीय और वन पारिस्थितिकी तंत्र की रक्षा करते हुए स्थानीय आजीविका को भी बनाए रखा है।

आकलन हाल के राजनीतिक बदलावों की ओर भी इशारा करता है। पिछले वर्ष के अंत में, वन-संपन्न देशों के नेताओं ने ब्राज़ाविल घोषणा को अपनाया, जिसमें आदिवासी भूमि अधिकारों को सुरक्षित करने, स्वतंत्र, पूर्व और सूचित सहमति को सुनिश्चित करने, वित्तीय संसाधनों को सीधे समुदायों तक पहुंचाने और आदिवासी ज्ञान प्रणालियों को जलवायु और जैव-विविधता रणनीतियों के केंद्र में मान्यता देने की प्रतिबद्धता जताई गई।

फिर भी, वित्तपोषण में बड़े अंतर बने हुए हैं। वनों की सुरक्षा के लिए वैश्विक स्तर पर अरबों डॉलर की प्रतिबद्धता जताई गई है, लेकिन इनमें से केवल लगभग ७.६ प्रतिशत धनराशि ही सीधे आदिवासी लोगों और स्थानीय समुदायों तक पहुंच पा रही है। आदिवासी संगठनों का कहना है कि प्रत्यक्ष और भरोसेमंद वित्तपोषण के बिना, समुदाय-नेतृत्व वाले संरक्षण के सफल मॉडलों का विस्तार संभव नहीं है।

जैसे-जैसे सरकारें २०३० तक भूमि और समुद्र के ३० प्रतिशत हिस्से की रक्षा जैसे वैश्विक लक्ष्यों को हासिल करने की कोशिश कर रही हैं, आदिवासी नेता चेतावनी देते हैं कि बहिष्कृत संरक्षण और विकास मॉडल दोहराने से मानवाधिकारों और पर्यावरणीय लक्ष्यों दोनों को नुकसान पहुंचेगा। रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि प्रथागत कानूनों द्वारा शासित आदिवासी क्षेत्रों को जीवंत प्रणालियों के रूप में मान्यता देना केवल न्याय का सवाल नहीं है, बल्कि वनों की रक्षा और जलवायु संकट से निपटने की सबसे प्रभावी रणनीतियों में से एक है।

तुरंत अपडेट प्राप्त करने के लिए यहाँ क्लिक करें और हमारे WhatsApp चैनल को फॉलो करें।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here