बर्धमान (पश्चिम बंगाल, भारत): वर्ष 2026 के पद्म श्री पुरस्कार के लिए चयनित रबिलाल टुडू को संताली साहित्य की अग्रणी आवाज़ों में से एक माना जाता है। पश्चिम बंगाल के संथाल समुदाय के टुडू का जीवन और कार्य उनकी भाषा, संस्कृति और लोककथा परंपराओं में गहराई से रचा-बसा है।
बर्धमान ज़िले के नोवारा गाँव में जन्मे टुडू का साहित्य से परिचय औपचारिक शैक्षणिक अध्ययन के माध्यम से नहीं, बल्कि संथाल समुदाय की मौखिक कथाओं, गीतों और नाटकों में रमे रहने से हुआ। धीरे-धीरे उन्होंने संताली में नाटक और साहित्यिक रचनाएँ लिखने का जुनून विकसित किया, जो आगे चलकर आजीवन साधना बन गया।
समय के साथ टुडू की रचनाएँ संथाल समाज और सांस्कृतिक जीवन की एक विशिष्ट अभिव्यक्ति के रूप में विकसित हुईं, जिनमें समुदाय, परंपरा, पहचान और जिजीविषा जैसे विषयों की पड़ताल की जाती है। अपनी सशक्त कथावाचन शैली और नाटकीय संवेदना के लिए प्रसिद्ध टुडू ने उन कथाओं और सांस्कृतिक प्रतीकों को संरक्षित किया है, जिनका प्रलेखन विरल है, और साथ ही उन्हें साहित्य व रंगमंच के माध्यम से उन्हें जीवित रखा है।
बैंकिंग पेशे में होने और आदिवासी भाषाओं के लिए सीमित साहित्यिक मंचों की चुनौतियों के बावजूद, उन्होंने निरंतर लेखन और नाटक निर्माण जारी रखा, जिससे संताली साहित्य के विकास और पहचान में महत्वपूर्ण योगदान हुआ। उनका समर्पण ऐसे समय में संथाल भाषा के नाट्य और साहित्यिक परंपराओं को संजोए रखने में निर्णायक रहा जब अनेक स्वदेशी भाषाएँ क्षय का सामना कर रही हैं।
टुडू के कार्यों को व्यापक मान्यता मिली है, जिसमें 2015 का साहित्य अकादमी पुरस्कार भी शामिल है, जिसने संताली साहित्य को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई। विद्वान और साहित्यप्रेमी उन्हें केवल लेखक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक संरक्षक मानते हैं। संथाल लेखकों की युवा पीढ़ी के लिए वे निरंतरता, जिजीविषा और स्वदेशी साहित्यिक परंपराओं पर गर्व का प्रतीक हैं।
पद्म श्री ने भले ही उनके योगदान को राष्ट्रीय ध्यान दिलाया हो, लेकिन राबीलाल टुडू की सच्ची विरासत उन कहानियों, नाटकों और सांस्कृतिक ज्ञान में निहित है, जिन्हें उन्होंने पीढ़ियों तक पहुँचाया, यह स्मरण कराते हुए कि भारत की साहित्यिक समृद्धि केवल संस्थानों से नहीं, बल्कि उन व्यक्तियों से भी जीवित रहती है जो इसे सहेजने के लिए अपना जीवन समर्पित करते हैं।
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