Home Blog 21वीं सदी में भी आदिवासियों का ही बलिदान?

21वीं सदी में भी आदिवासियों का ही बलिदान?

ग्रीनलैंड को खरीदने या नियंत्रित करने की इच्छा जतानेवाला ट्रम्प का बयान पूंजीवादी और औपनिवेशिक मानसिकता को ही उजागर करता है

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इतिहास चाहे कितना भी आगे बढ़ जाए, तकनीक चाहे जितनी भी आधुनिक हो जाए, एक कड़वा सच बार-बार सामने आता है – जब भी अन्याय होता है, उसका सबसे बड़ा शिकार अक्सर आदिवासी और मूलनिवासी समुदाय ही बनते हैं। ग्रीनलैंड में इनुइट आदिवासियों की भूमि को लेकर चल रही वैश्विक चर्चाओं ने एक बार फिर इसी सच्चाई को उजागर किया है।

ग्रीनलैंड केवल बर्फ से ढका हुआ क्षेत्र नहीं है, बल्कि यह हजारों वर्षों से इनुइट आदिवासियों का घर रहा है। लेकिन आज वैश्विक सत्ता संघर्ष, प्राकृतिक संसाधनों की लालसा और सैन्य रणनीतियों के कारण इस भूमि को एक वस्तु की तरह देखा जा रहा है। विशेष रूप से अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा ग्रीनलैंड को “खरीदने” या किसी तरह नियंत्रित करने की इच्छा जताना केवल एक राजनीतिक बयान नहीं है, बल्कि आदिवासी अस्मिता पर सीधा आघात है।  यह बयान पूंजीवादी और औपनिवेशिक मानसिकता को ही उजागर करती है।

यह बात किसी को नहीं भूलनी चाहिए कि अमेरिका स्वयं मूलनिवासी रेड इंडियन समुदाय के दमन, विस्थापन और संहार की पीड़ा से होकर अस्तित्व में आया हुआ देश है। अमेरिकी सत्ता की नींव स्थानीय आदिवासियों की भूमि हड़पकर और उनके खून पर रखी गई। यह ऐतिहासिक सत्य पूरी दुनिया जानती है। लेकिन आज उसी अन्याय को 21वीं सदी में ग्रीनलैंड जैसे क्षेत्रों में दोहराने की मानसिकता दिखाई दे रही है।

ग्रीनलैंड की अधिकांश आबादी इनुइट आदिवासियों की है। उनकी संस्कृति में भूमि निजी संपत्ति नहीं, बल्कि सामूहिक विरासत मानी जाती है। “भूमि को खरीदने-बेचने” की अवधारणा ही उनके लिए अस्वीकार्य है। इसके बावजूद वैश्विक शक्तियाँ इस क्षेत्र को केवल खनिज संपदा, महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों और रणनीतिक लाभ के नजरिए से देख रही हैं। एक इनुइट प्रतिनिधि ने अपनी टिप्पणी से समुदाय के दर्द को बड़े सटीक तरीके से प्रकट किया, जब उन्होंने कहा – “बेहतर उपनिवेशवादी जैसी कोई चीज नहीं होती।” इससे एक बार फिर स्पष्ट होता है कि समय बदला, हालात बदले, सत्ता बदली, लेकिन आदिवासियों पर होने वाला अन्याय आज भी जारी है।

यह प्रश्न केवल ग्रीनलैंड तक ही सीमित नहीं है। अफ्रीका, एशिया, लैटिन अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया, दुनिया के हर कोने में आदिवासी समुदाय अपनी भूमि, जंगल, जल और पहचान की रक्षा के लिए संघर्ष कर रहे हैं। विकास, राष्ट्रीय हित और वैश्विक सुरक्षा जैसे जुमलों की आड़ में बार-बार आदिवासी अधिकारों को कुचला गया है।

आज आवश्यकता है वैश्विक स्तर पर सशक्त और स्पष्ट विरोध की। ग्रीनलैंड के इनुइट आदिवासियों की भूमि से जुड़े किसी भी निर्णय में उनकी सहमति के बिना आगे बढ़ना न केवल अवैधानिक बल्कि अनैतिक भी है। दुनिया भर के आदिवासी समुदायों की अस्मिता की रक्षा, उनकी संस्कृतियों का संरक्षण और उनके आत्मनिर्णय के अधिकार को स्वीकार करना पूरे मानव समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है।

यदि 21वीं सदी में मानवाधिकार, लोकतंत्र और समानता केवल शब्द नहीं बल्कि वास्तविक मूल्य बनने हैं, तो आदिवासियों पर हो रहे ऐतिहासिक अन्याय को रोकना ही होगा। अन्यथा इतिहास स्वयं को बार-बार दोहराता रहेगा, और उसका सबसे बड़ा खामियाजा हमेशा आदिवासी समाज को ही भुगतना पड़ेगा।

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