रेनो (नेवाडा, संयुक्त राज्य अमेरिका): संयुक्त राज्य अमेरिका के नेवाडा और कैलिफ़ोर्निया के वाशो जनजाति ने लेक ताहो के उत्तर-पूर्व में अपने पूर्वजों की १०,००० एकड़ से अधिक भूमि खरीदी है। यह जो सिएरा नेवाडा में सबसे बड़े जनजातीय भूमि वापसी में से एक और कैलिफ़ोर्निया के इतिहास में तीसरी सबसे बड़ी वापसी है। यह भूमि इस महीने की शुरुआत में जनजाति के वाशी•शीव भूमि ट्रस्ट ने खरीदी। यह सदियों से विस्थापन के दौरान खोए हुए क्षेत्र को पुनः प्राप्त करने के जनजाति के लंबे प्रयास में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है।
यह संपत्ति पहले लॉयलटन रैंच के नाम से जानी जाती थी और रेनो से लगभग २० मील उत्तर में स्थित है। अब इसे वेलमेल्टी प्रिज़र्व नाम दिया गया है। इस संपत्ति में कई तरह के पेड़ हैं और यह वन्यजीवों के लिए आवश्यक आवास प्रदान करती है।
इस सौदे की कीमत ६० लाख डॉलर थी। यह अधिग्रहण विभिन्न स्रोतों से मिली राशि के कारण संभव हुआ। इस में कैलिफ़ोर्निया वन्यजीव संरक्षण बोर्ड से ५५ लाख डॉलर का अनुदान और निजी दान शामिल हैं। कुल जुटाई गई राशि लगभग ६९ लाख डॉलर थी। जनजाति के अधिकारी अब दीर्घकालिक संरक्षण और भविष्य की भूमि पुनः प्रत्यर्पण प्रयासों के समर्थन के लिए और धन जुटाने पर काम कर रहे हैं।
इस भूमि का प्रबंधन वाशी•शीव लैंड ट्रस्ट प्रिज़र्व करेगा। इससे पहले युरोक जनजाति ने पिछले जून में लोअर क्लैमथ रिवर के पास लगभग ४७,००० एकड़ भूमि प्राप्त की थी। टुले रिवर जनजाति ने २०२४ में तुलारे काउंटी में अपने पूर्वजों की १४,६७२ एकड़ भूमि वापस ली।
वाशो जनजाति को लेक ताहो के आसपास अपनी पूर्वज भूमि से १९वीं सदी के उपनिवेशीकरण, अतिक्रमण और संसाधन शोषण के चलते जबरन विस्थापित किया गया। कैलिफ़ोर्निया और नेवाडा के गोल्ड रश में खनिक बड़ी संख्या में यहाँ आए और ज़मीन पर कब्ज़ कर लिया। भूमि सुरक्षा के लिए हुई संधियों की अनदेखी की गई या कभी अनुमोदित नहीं किया गया। बड़े पैमाने पर पशुपालन, वनीकरण और बाद में पर्यटन विकास के नाम पर वाशे जनजाति के लोगोे के शिकार करने, मछली पकड़ने और पवित्र स्थलों तक जाने के अधिकारों पर प्रतिबंध लगाए गए। इस विस्थापन ने वाशो लोगों को उनके सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और पारिस्थितिक जड़ों से दूर कर दिया था।
संयुक्त राज्य अमेरिका में १८वीं और १९वीं शताब्दियों के दौरान अनेक मूल अमेरिकी जनजातियों ने युद्ध, जबरन विस्थापन, तोड़े गए समझौतों तथा अतिक्रमण और संसाधन दोहन को बढ़ावा देने वाली संघीय नीतियों के कारण अपनी पैतृक भूमि का विशाल हिस्सा खो दिया था। सन १८८७ के डॉज़ अधिनियम जैसे कानूनों ने जनजातीय क्षेत्रों को खंडित कर दिया, जबकि बाद की विकास परियोजनाओं ने मूलनिवासी भू-स्वामित्व को और घटा दिया। हाल के दशकों में “भूमि वापसी” आंदोलन के माध्यम से मूलनिवासी समुदायों की ज़मीन का स्वामित्व उन्हें लौटाने के प्रयास हो रहे हैं। ये प्रयास मूलनिवासी समूह के प्रतिनिधि करते हैं। यह भूमि वापसी खरीद, संघीय हस्तांतरण, संरक्षण साझेदारियों या कानूनी समझौतों के माध्यम हो रही है। इसका उद्देश्य अन्याय को सुधारना, सांस्कृतिक पुनर्जीवन, पर्यावरणीय संरक्षण और जनजातीय आत्मनिर्णय को सशक्त करना है।
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