Home Asia आदिवासी कला महोत्सव २०२६ में आदिवासी रचनात्मकता और बाज़ार अवसरों पर फोकस

आदिवासी कला महोत्सव २०२६ में आदिवासी रचनात्मकता और बाज़ार अवसरों पर फोकस

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भारत के आदिवासी मामलों के मंत्री जुअल ओराम नई दिल्ली में हो रहे आदिवासी कला महोत्सव में।

नई दिल्ली (भारत): आदिवासी कला महोतस्व ट्राइब्स आर्ट फेस्ट (TAF) २०२६ नई दिल्ली के ऐतिहासिक त्रावणकोर पैलेस में शुरू है। इसमें ७५ से अधिक प्रमुख आदिवासी कलाकार एकत्रित हुए हैं और पूरे भारत की लगभग ३० अलग-अलग आदिवासी कला परंपराओं में से लगभग १,००० कलाकृतियों को प्रदर्शित किया गया है। कुल १२ दिनों तक चलनेवाला का यह उत्सव २ मार्च को प्रारंभ हुआ और ३ मार्च से १३ मार्च तक जनता के लिए खुला रहेगा। इसका उद्देश्य आदिवासी रचनात्मकता को उजागर करना, सांस्कृतिक मान्यता को मजबूत करना और आदिवासी कलाकारों के लिए स्थायी बाज़ार अवसर निर्माण करना है।

भारत के आदिवासी मामलों के मंत्रालय द्वारा भारतीय वाणिज्य और उद्योग मंडल महासंघ (FICCI) और नेशनल गैलरी ऑफ मॉडर्न आर्ट (NGMA) के सहयोग से आयोजित इस उत्सव में प्रदर्शनी, लाइव पेंटिंग प्रदर्शन, वॉकथ्रू, पैनल चर्चाएँ, इंटरैक्टिव कार्यशालाएँ, कलाकार-छात्र मार्गदर्शन सत्र और पारंपरिक संगीत और नृत्य पर आधारित दैनिक सांस्कृतिक प्रस्तुतियाँ शामिल हैं। यह कार्यक्रम विरासत को आधुनिक मंचों से जोड़ने और आदिवासी कलाकारों को सीधे खरीदारों, गैलरी, कॉर्पोरेट भागीदारों और सांस्कृतिक संस्थानों से जोड़ने के लिए डिज़ाइन किया गया है।

भारत के आदिवासी मामलों के मंत्री जुअल ओराम ने उत्सव का उद्घाटन किया, और आदिवासी विरासत के संरक्षण के साथ-साथ आदिवासी समुदायों के सामाजिक-आर्थिक सशक्तिकरण के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता दोहराई। मंत्री ने आदिवासी सशक्तिकरण के लिए मंत्रालय के समेकित दृष्टिकोण को रेखांकित किया, जिसमें सांस्कृतिक संरक्षण को आजीविका वृद्धि और आदिवासी कला रूपों के लिए मजबूत बाज़ार संबंधों से जोड़ा गया। उन्होंने जोर दिया कि ट्राइब्स आर्ट फेस्ट जैसे कार्यक्रम केवल प्रतीकात्मक उत्सव नहीं हैं, बल्कि संरचित बाज़ार और प्रदर्शनी के माध्यम से सांस्कृतिक विरासत को आदिवासी कलाकारों के लिए स्थायी आजीविका में बदलने में मदद करते हैं।

प्रदर्शनी में प्रदर्शित विविध कला में वारली (महाराष्ट्र), गोंड (मध्य प्रदेश), भील (मध्य प्रदेश, राजस्थान, गुजरात), डोकरा (पश्चिम बंगाल, ओडिशा, छत्तीसगढ़), सोहराई (झारखंड), कोया (तेलंगाना, आंध्र प्रदेश), कुरुंबा (तमिलनाडु), साउरा (ओडिशा), बोडो (असम और उत्तर-पूर्व), ओरांव (झारखंड, छत्तीसगढ़) और मंडाना (राजस्थान, मध्य प्रदेश) सहित पारंपरिक और आधुनिक अभिव्यक्तियाँ शामिल हैं। वस्त्र कला, मूर्तिकला, शिल्प और ललित कला में काम क्षेत्रीय विविधता और सदियों पुरानी सांस्कृतिक निरंतरता को दर्शाते हैं। यह उत्सव उत्तर-पूर्व भारत की बाँस की कलाओं और अन्य अद्वितीय आदिवासी कला प्रथाओं को भी उजागर करता है।

कलात्मक प्रदर्शनी के अलावा, उत्सव में आदिवासी कला पुनर्जीवन और स्थायी भविष्य, आधुनिक क्षेत्रों में आदिवासी कला और आजीविका एवं बाज़ार संबंध जैसी विषयों पर चर्चाएँ आयोजित की जाती हैं, जो विरासत अभ्यास से आर्थिक लचीलापन तक के मार्गों पर गहन संवाद का मंच प्रदान करती हैं। सहभागी कार्यशालाएँ, आदिवासी कला के माध्यम से कहानी सुनाना और लाइव प्रदर्शन आगंतुकों को रचनात्मक प्रक्रिया में शामिल करते हैं और आदिवासी परंपराओं के प्रति सराहना बढ़ाते हैं।

भारत के विभिन्न हिस्सों से १०० से अधिक आदिवासी कला के छात्र वरिष्ठ कलाकारों के साथ वॉकथ्रू और मार्गदर्शन सत्रों में भाग ले रहे हैं, जिससे ज्ञान हस्तांतरण और पेशेवर अनुभव सुनिश्चित होता है। अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर आदिवासी महिला कलाकारों में नेतृत्व और उद्यमिता पर विशेष कार्यक्रम आयोजित किया जाएगा, जो समावेशिता और समुदाय की भागीदारी, जिसमें विशेष आवश्यकता वाले व्यक्तियों के सत्र भी शामिल हैं, पर उत्सव की प्रतिबद्धता को और मजबूत करता है।

मंत्रालय का दृष्टिकोण है कि ट्राइब्स आर्ट फेस्ट आदिवासी कला के लिए राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय दृश्यता बढ़ाएगा, सीधे बाज़ार पहुँच के माध्यम से आजीविका के अवसर मजबूत करेगा और आदिवासी कला को भारत की रचनात्मक अर्थव्यवस्था के एक गरिमामय और स्थायी स्तंभ के रूप में स्थापित करेगा। यह उत्सव भारत सरकार के व्यापक दृष्टिकोण—सर्वसमावेशी विकास, सांस्कृतिक संरक्षण और आदिवासी समुदायों के आर्थिक सशक्तिकरण—के साथ मेल खाता है।

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