
नागपुर (महाराष्ट्र, भारत): मुंबई (भारत) में ऑस्ट्रेलियाई महावाणिज्य दूत पॉल मर्फी ने कहा है कि दुनिया के विभिन्न देशों के आदिवासी और मूलनिवासी लोगों की समस्याएँ काफी समान हैं और उन्हें सामूहिक रूप से हल करने का प्रयास किया जाना चाहिए।
वे नागपुर में गुरुवार को आदिवासी अधिकार संगठन (OFROT) के कार्यालय में आदिवासी प्रतिनिधियों और कार्यकर्ताओं की एक सभा को संबोधित कर रहे थे। मर्फी ने कहा के ऑस्ट्रेलियाई विदेश मंत्रालय यह सुनिश्चित करने का प्रयास कर रहा है कि ऑस्ट्रेलिया के आदिवासी लोग अन्य देशों के आदिवासी लोगों से जुड़ सकें। उन्होंने कहा कि आदिवासी लोग पिछले ६५,००० वर्षों से ऑस्ट्रेलिया में बसे हुए हैं। हालांकि उपनिवेशवाद ने उनकी परंपराओं और संस्कृति को काफी प्रभावित किया, लेकिन उन्होंने संघर्ष कर अपने अधिकार वापस हासिल किए।
मर्फी ने कहा कि ऑस्ट्रेलियाई सरकार उन मुद्दों पर चर्चा, समन्वय और सहयोग करना चाहती है जिनका सामना ऑस्ट्रेलिया और भारत के आदिवासी लोग कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि OFROT को ऐसे समन्वय और चर्चा के लिए चुना गया है।
एक प्रश्न के उत्तर में मर्फी ने कहा कि यह सत्य नहीं है कि हाल के समय में ऑस्ट्रेलिया में गैर-आदिवासी और आदिवासी लोगों के बीच तनाव बढ़ा है। (प्रश्न में इस साल की शुरुआत में ऑस्ट्रेलिया डे समारोहों और ANZAC डे समारोहों के दौरान हुई घटनाओं और ब्रिस्बेन में प्रस्तावित ओलंपिक स्टेडियम का आदिवासी समूहों द्वारा विरोध का उल्लेख था।) मर्फी ने कहा हालांकि तनाव बढ़ा नहीं है, फिर भी ऑस्ट्रेलियाई लोगों को आदिवासी लोगों के अधिकारों के प्रति संवेदनशील बनाने की आवश्यकता है।
उन्होंने कहा कि ऑस्ट्रेलियाई सरकार देश के आदिवासी लोगों की जीवनशैली, भाषाओं और संस्कृति को संरक्षित करने के लिए प्रतिबद्ध है। मर्फी ने ऑफ्रोट के कार्य की प्रशंसा की और आश्वस्त किया कि भारत के आदिवासी उद्यमियों के लिए ऑस्ट्रेलिया में व्यापार और वाणिज्य के अवसर प्रदान करने के प्रयास किए जाएंगे।

इससे पहले मर्फी और ऑस्ट्रेलियाई महावाणिज्य दूतावास मुंबई में नीति और दौरा प्रबंधक एरिका सेक्वेरा का ऑफ्रोट कार्यालय पहुँचने पर पारंपरिक तरीके से स्वागत किया गया। ऑफ्रोट के अध्यक्ष एड. राजेंद्र मरसकोल्हे ने प्रारंभिक टिप्पणी की और मर्फी को संगठन के कार्य के बारे में जानकारी दी। मरसकोल्हे ने कहा कि संगठन ने आदिवासी लोगों के न्याय सुनिश्चित करने के लिए अदालतों में लड़ाई लड़ी है, जिसमें उनके वन अधिकार और सरकारी कार्यालयों में भर्ती शामिल हैं। इसके अलावा संगठन ने गैर-आदिवासी व्यक्तियों द्वारा नकली प्रमाणपत्रों के आधार पर भरे गए पदों को खाली कर उन पर आदिवासी उम्मीदवारों की नियुक्ति सुनिश्चित की है।
महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र ऑफ्रोट की इकाइयों के पदाधिकारी कार्यक्रम में उपस्थित थे। इनमें सोपचंद सिरसाम और रवी सलामे (भंडारा), विजय कुमारे और शंकर मडावी (चंद्रपुर), वैष्णव कटंगे और अमित तुमडाम (गडचिरोली), दादाराव इंगळे और समाधान जावळे (अकोला), गणेश डाखोरे, तथा बंडू कोकाटे और राम जुमडे (हिंगोली) शामिल थे। इसके अलावा स्थानीय इकाई के पदाधिकारी नितेश सिडाम, बाबा कुमरे, मंगला मसराम, डॉ. संगीता भलावी, जी. एम. साखरकर, विनोद डाबेराव, राधेश्याम उइके, अनिल कुमरे और अनिल पेदामकर शामिल हैं। महेन्द्र उईके ने कार्यक्रम का संचालन किया और ऑफ्रोट के सचिव नंदकिशोर कोडापे ने आभार प्रदर्शन किया।
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महाराष्ट्र सरकार ने हाल ही में एक निर्णय लिया है जिस के तहत सरकारी नौकरियों में आरक्षित वर्गों के उम्मीदवारों को आरक्षित वर्गों के पदों पर ही नियुक्त किया जाएगा. मतलब उन्हें उनकी योग्यता के आधार पर भी सामान्य वर्ग के पदों पर अवसर नहीं मिलेगा। यह फैसला सामाजिक न्याय और समान अवसर की भावना के खिलाफ है।
भारतीय संविधान सभी नागरिकों को समान अवसर देने की बात करता है। आरक्षण व्यवस्था का उद्देश्य वंचित समुदायों को शिक्षा और रोजगार में उचित प्रतिनिधित्व देना है। लंबे संघर्ष और कठिन परिस्थितियों में पढ़ाई करके जब कोई विद्यार्थी या उम्मीदवार सामान्य वर्ग की कटऑफ पार करता है, तो उसे उसकी योग्यता के आधार पर अवसर मिलना चाहिए। यही संविधान और न्यायालयों की भावना रही है।
उच्चतम न्यायालय ने भी कई मामलों में स्पष्ट किया है कि सामान्य वर्ग की सीटें सभी नागरिकों के लिए खुली होती हैं। यदि आरक्षित वर्ग का कोई उम्मीदवार सामान्य वर्ग के लिए योग्य पाया जाता है तो उसे सामान्य वर्ग में अवसर मिलना चाहिए।
गुणवत्ता केवल अंकों से नहीं नापी जा सकती। कई छात्र आर्थिक कठिनाइयों, सामाजिक भेदभाव और सीमित संसाधनों के बावजूद सफलता प्राप्त करते हैं। इसलिए संघर्ष से हासिल की गई उपलब्धि भी वास्तविक योग्यता का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
महाराष्ट्र में सामाजिक सुधार की परंपरा रही है। इसलिए समाज के सभी वर्गों को समान अवसर और संवैधानिक अधिकार मिलते रहना आवश्यक है। राज्य सरकार के इस निर्णय से पिछड़े वर्गों के लिए सामान्य वर्ग के दरवाज़े बंद हो जाएंगे। इससे आनेवाले समय में शिक्षा, पदोन्नति और प्रतिनिधत्व इन सभी क्षेत्रों में समानता और समान अवसर बाधित होंगे।
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