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सिकल सेल रोग के इलाज के करीब है भारत

आदिवासी समुदायों में बहुत अधिक पाया जाता है सिकल सेल रोग

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कार्यशाला में उपस्थित प्रतिभागी।

नयी दिल्ली (भारत): भारत सिकल सेल रोग (SCD) के लिए घरेलू रूप से विकसित और किफायती इलाज खोजने की दिशा में एक कदम आगे बढ़ चुका है। सिकल सेल रोग भारत के आदिवासी समुदायों में असामान्य रूप से अधिक पाया जाता है।

इस इलाज को जीन-संपादन थेरेपी के माध्यम से विकसित किया जा रहा है, जो CRISPR (क्लस्टर्ड रेगुलरली इंटरस्पेस्ड शॉर्ट पैलिंड्रोमिक रिपीट्स) तकनीक पर आधारित है। CRISPR एक जीन-संपादन तकनीक है जिससे वैज्ञानिकों जीवित जीवों के भीतर DNA को सटीक रूप से संशोधित कर सकते हैं। इसे ‘बिरसा-१०१’ भारत के उभरते जैव-प्रौद्योगिकी एवं जीनोमिक अनुसंधान तंत्र में महत्वपूर्ण उपलब्धि है। यह पहल सिकल सेल रोग के उन्मूलन हेतु भारत सरकार की ओर से निरंतर किए जा रहे प्रयासों को आगे बढ़ाती है, क्योंकि यह रोग देश के अनेक क्षेत्रों में जनजातीय आबादी को असमान रूप से प्रभावित करता है। यह भारत में अपने तरह का पहला प्रयास है। इसका नाम आदिवासी प्रतीक भगवान बिरसा मुंडा के नाम पर रखा गया है।

एक आधिकारिक प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार यह अब भारत के जैव प्रौद्योगिकी और जीनोमिक्स अनुसंधान पारिस्थितिकी तंत्र में एक मील का पत्थर बनकर उभर रहा है। र इस तकनीकी ढांचे को सामूहिक क्लीनिकल और विनिर्माण विकास के लिए सीरम इंस्टिट्यूट ऑफ इंडिया प्रा. लि. को हस्तांतरित किया जा रहा है।

सीएसआईआर-आईजीआईबी के निदेशक डॉ. सऊविक मैती का स्वागत करती हुईं जनजातीय कार्य मंत्रालय में सचिव रंजना चोपड़ा।

जनजातीय कार्य मंत्रालय ने अनुसंधान, नवाचार और आदिवासी कल्याण पर केंद्रित किफायती स्वास्थ्य देखभाल हस्तक्षेपों को मजबूत करने के अपने निरंतर प्रयासों अंतर्गत इसके लिए लगभग ३.७५ करोड़ रुपये की वित्तीय सहायता प्रदान की है।

जनजातीय कार्य मंत्रालय ने वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद (CSIR) तथा CSIR-जिनोमिकी और समवेत जीव विज्ञान संस्थान (CSIR-IGIB) के सहयोग से जनजातीय गरिमा उत्सव के अंतर्गत हाल ही में  नई दिल्ली स्थित CSIR-IGIB में सिकल सेल रोग के लिए इस पर कार्यशाला का आयोजन किया था। यह कार्यशाला जनजातीय गमिरा उत्सव के हिस्से के रूप में आयोजित की गई थी, जो विकसित भारत की यात्रा का एक माह लंबा उत्सव है। पहले सप्ताह को “विकास चालक के रूप में प्रौद्योगिकी” को समर्पित किया गया है, जो नवाचार-प्रेरित परिवर्तन और आदिवासी विकास और कल्याण को तेज करने वाली तकनीकी उपलब्धियों को उजागर करता है, प्रेस विज्ञप्ति ने कहा।

CSIR-IGIB के निदेशक डॉ. देबोज्योति चक्रवर्ती ने बिरसा १०१ और CRISPR-आधारित जीन-संपादन तकनीकों पर विस्तृत तकनीकी प्रस्तुति दी। उन्होंने २०१७ से भारतीय पहल की प्रगति को ट्रेस किया और सिकल सेल रोग के लिए एक घरेलू और किफायती जीन-संपादन चिकित्सीय मार्ग विकसित करने के प्रयासों को रेखांकित किया।

कार्यशाला को संबोधित करते हुए जनजातीय कार्य मंत्रालय में सचिव श्रीमती रंजना चोपड़ा ने जनजातीय समुदायों के लिए स्वास्थ्य सेवाओं की पहुँच को बेहतर बनाने हेतु उन्नत वैज्ञानिक अनुसंधान और स्वदेशी नवाचार के उपयोग के महत्व पर ज़ोर दिया और अंतिम छोर तक किफायती स्वास्थ्य सेवाओं की प्रभावी पहुँच सुनिश्चित करने के लिए वैज्ञानिक संस्थानों और सरकारी एजेंसियों के बीच मजबूत सहयोग की आवश्यकता पर भी बल दिया।

उन्होंने सिकल सेल योद्धाओं एवं रोगी अधिकार समर्थकों गौतम डोंगरे और फरहत नाज़ से भी बातचीत की । उन दोनों ने अपनी व्यक्तिगत जीवन-यात्राओं को साझा करते हुए जल्‍द निदान, जागरूकता बढ़ाने, हाइड्रॉक्सीयूरिया जैसी दवाओं की व्यापक उपलब्धता तथा वंचित क्षेत्रों में निरंतर स्वास्थ्य सहायता के महत्व पर ज़ोर दिया।

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