Home In Brief आदिवासी संस्कृति विश्व को दे सकती है नई दिशा – कुसुमताई आलाम

आदिवासी संस्कृति विश्व को दे सकती है नई दिशा – कुसुमताई आलाम

प्रथम राज्यस्तरीय आदिवासी साहित्य एवं संस्कृति सम्मेलन नाशिक में संपन्न

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सम्मेलन में उपस्थित अतिथिगण।

नाशिक (महाराष्ट्र, भारत) आदिवासी समाज मूलतः समानता पर आधारित समाज है, जहां स्त्री और पुरुष के बीच किसी प्रकार का सामाजिक भेदभाव नहीं किया जाता। केवल प्रकृति द्वारा दिए गए जैविक अंतर को छोड़ दें तो आदिवासी संस्कृति में स्त्री-पुरुष समानता, सामूहिक निर्णय प्रक्रिया, सहअस्तित्व और बंधुत्व की परंपरा गहराई से रची-बसी है। उच्च-नीच, दहेज प्रथा, व्यक्तिपूजा, लूटमार और हिंसा जैसी कुप्रथाएं आदिवासी समाज में नहीं पाई जातीं। यही कारण है कि आदिवासी संस्कृति की सभ्यता आज पूरे विश्व के लिए मार्गदर्शक बन सकती है। यह विचार प्रथम राज्यस्तरीय आदिवासी साहित्य एवं संस्कृति सम्मेलन की अध्यक्षा कुसुमताई आलाम ने अपने अध्यक्षीय भाषण में व्यक्त किए।

नाशिक में आयोजित इस सम्मेलन का उद्घाटन पूर्व जिला परिषद अध्यक्ष सुहास नाईक के हाथों संपन्न हुआ। इसके पश्चात ‘क्या आदिवासियों का वास्तविक जीवन साहित्य में प्रतिबिंबित होता है?’ विषय पर एक परिसंवाद आयोजित किया गया। यह परिसंवाद डॉ. संजय लोहकरे की अध्यक्षता में हुआ।

परिसंवाद में वक्ताओं ने आदिवासी समाज के समक्ष उपस्थित चुनौतियों और साहित्य की भूमिका पर अपने विचार रखे। रवी बुधर ने आदिवासी लोकसाहित्य के विकृतिकरण पर चिंता व्यक्त की। सुलतान पवार ने प्रश्न उठाया कि जल, जंगल और जमीन की रक्षा करने वाला आदिवासी समाज विकास की मुख्यधारा से वंचित क्यों है? राजू ठोकळ ने वर्तमान सामाजिक जरूरतों के अनुरूप लेखन की आवश्यकता पर बल दिया। पद्माकर सहारे ने आदिवासियों की प्राचीन ऐतिहासिक पहचान स्पष्ट की, जबकि मधुचंद्र भुसारे ने कहा कि आदिवासी साहित्य पूरी तरह वास्तविक जीवन की धरातल पर खड़ा है। डॉ सखाराम डाखोरे ने आदिवासी लेखकों की उपेक्षा पर तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि उन्हें अनदेखा कर साहित्यिक परंपरा को नुकसान पहुंचाया जा रहा है।

अपने भाषण में डॉ. लोहकरे ने कहा कि तारपा वादन जैसी लोककलाओं का सैद्धांतिक अध्ययन और दस्तावेजीकरण होना चाहिए। उन्होंने कहा कि साहित्य केवल अभिव्यक्ति तक सीमित न रहे, बल्कि एक सामाजिक आंदोलन का रूप ले और यह समय की मांग है। उन्होंने आगे कहा कि कला जीवन में आनंद भरती है, जबकि साहित्य समाज को विचार देता है। इसलिए साहित्यकारों को केवल यथार्थ प्रस्तुत करने तक सीमित न रहकर आगे की दिशा भी सुझानी चाहिए। सम्मेलन में यह भी चिंता जताई गई कि आदिवासी समाज की 102 बोलीभाषाएं लुप्त होने की कगार पर हैं। वक्ताओं ने कहा कि बोलीभाषा ही आदिवासी अस्मिता की पहली पहचान है, और यदि भाषाएं नष्ट हुईं तो संस्कृति की जड़ें कमजोर हो जाएंगी।

महिला सत्र में ‘आदिवासी महिला सशक्तिकरण एवं रोजगार’ विषय पर चर्चा हुई, जिसकी अध्यक्षता प्रतिभा चौरे ने की। सुरेखा लेंभे, भावना इलपाची, जया सोनवणे और भारतीताई भोये ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि आदिवासी महिलाओं को कर्मकांडों की सीमाओं से बाहर निकलकर स्वनिर्णय की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनना चाहिए।

सम्मेलन के अंतर्गत आयोजित विशेष साक्षात्कार सत्र में पद्मश्री सम्मानित भिकल्या धिंडा, भीमसिंग वळवी, प्राचार्य अशोक बागुल, प्राचार्य मोतीराम देशमुख तथा डॉ संतोष सुपे से देवचंद महाले ने संवाद किया। इसके बाद संतोष पावरा की अध्यक्षता में नवकवि सम्मेलन तथा कवी तुकाराम धांडे की अध्यक्षता में आमंत्रित कवि सम्मेलन आयोजित किया गया।

इस अवसर पर वाहरू सोनवणे और चंद्रकांत घाटाळ को जीवनगौरव पुरस्कार से सम्मानित किया गया। विभिन्न आदिवासी बोलीभाषाओं में साहित्य सृजन करने वाले लेखकों का भी सम्मान किया गया।

कार्यक्रम का संचालन दशरथ भोये, पंकज ठाकरे और सविता थवील ने किया। आयोजन को सफल बनाने में संकल्प आदिवासी युवा जागृति संगठन तथा आदिवासी कला संस्कृति एवं साहित्य अकादमी का विशेष योगदान रहा।

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