मैसूरु (कर्नाटक, भारत): आदिवासी स्वास्थ्य परंपराओं की रक्षा और आदिवासी लोगों को निवारक और उपचारात्मक सेवाएँ आसानी से मिलने के लिए संवेदनशल नीतियाँ आवश्यक है। यह कथन इस माह की शुरुआत में भारत के कर्नाटक राज्य के मैसूरु में आदिवासी स्वास्थ्य प्रथाओं पर वैश्वीकरण के प्रभाव इस विषय पर आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला में उपस्थित विशेषज्ञों द्वारा किया गया। विशेषज्ञों और सामुदाय के प्रतिनिधियों ने वैश्वीकरण और बदलती सांस्कृतिक गतिशीलताओं के आदिवासी कल्याण पर प्रभावों पर चर्चा की। कार्यशाला में आदिवासी स्वास्थ्य और पारंपरिक उपचार प्रणालियों पर विशेष रूप से चर्चा हुई।
कार्यशाला को संबोधित करते हुए सरकारी आयुर्वेद अनुसंधान केंद्र के सहायक निदेशक लक्ष्मीनारायण शेनॉय ने आदिवासी संस्कृति और प्रकृति के बीच अंतर्निहित संबंध को रेखांकित किया और इसे भारत की विरासत के लिए मौलिक बताया। उन्होंने कहा कि आदिवासी समुदायों ने पीढ़ियों से अपने पर्यावरण के साथ सहजीवी संबंध बनाए रखा है। वे जंगलों पर केवल आजीविका के लिए ही नहीं बल्कि पवित्र पारिस्थितिकी तंत्र के रूप में निर्भर रहे हैं। यह उनके स्वास्थ्य और आध्यात्मिक प्रथाओं को दिशा देता है। औषधीय पौधों और हर्बल उपचारों के बारे में आदिवासी ज्ञान सदियों के अनुभवजन्य अधिगम का प्रतिनिधित्व करता है, जिस पर आधुनिकीकरण और उदार आर्थिक प्रणालियों के युग में ख़तरा बना हुआ है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि इन प्रथाओं के मूल्य को मान्यता देने के लिए स्वयं आदिवासी वनवासियों के साथ प्रत्यक्ष संवाद आवश्यक है।
कर्नाटक राज्य आदिवासी अनुसंधान संस्थान के निदेशक योगेश टी ने वीडियो कॉन्फ्रेंस के माध्यम से प्रतिभागियों को संबोधित किया। उन्होंने कहा कि आदिवासी प्रतिनिधियों तथा शिक्षाविदों से आदिवासी क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवा वितरण में सुधार के लिए क्रियान्वयन योग्य सिफारिशें विकसित करने की आवश्यकता है। इन प्रस्तावों को राज्य प्राधिकारियों के साथ बजट-पूर्व परामर्श के दौरान प्रस्तुत किया जाएगा ताकि आदिवासी आबादी के लिए उन्नत चिकित्सा सुविधाओं और लक्षित समर्थन की वकालत की जा सके।
कार्यशाला में आंध्र प्रदेश, केरल, तेलंगाना और दिल्ली से आए विद्वानों द्वारा ६३ से अधिक शोधपत्र प्रस्तुत किए गए। इन शोधपत्रों में सामुदायिक स्वास्थ्य प्रथाओं, स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच में बाधाओं, तथा पारंपरिक और आधुनिक स्वास्थ्य सेवाओं के एकीकरण की रणनीतियों सहित विभिन्न मुद्दों की पड़ताल की गई।
इस कार्यशाला का आयोजन भारत सरकार के जनजातीय कार्य मंत्रालय, कर्नाटक सरकार के जनजातीय कल्याण विभाग, और मैसूरु के कर्नाटक राज्य आदिवासी अनुसंधान संस्थान द्वारा किया गया।
तुरंत अपडेट प्राप्त करने के लिए यहाँ क्लिक करें और हमारे WhatsApp चैनल को फॉलो करें।




