Home In Brief “बंजारा को अनुसूचित जनजाति की सूची में न डालें”

“बंजारा को अनुसूचित जनजाति की सूची में न डालें”

ट्रायबल फोरम की मांग: राज्यपाल, मुख्यमंत्री को ज्ञापन

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प्रातिनिधिक चित्र।

मुंबई (महाराष्ट्र, भारत): ट्रायबल फोरम नामक संगठन ने बंजारा समुदाय का समावेश अनुसूचित जनजाति की सूची में न करने की मांग की है। संगठन ने यह मांग महाराष्ट्र के राज्यपाल, मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री ऐवं आदिवासी विकास मंत्री को भेजे गए ज्ञापन में की है।

ट्रायबल फोरम की नंदुरबार जिला इकाई के अध्यक्ष नितीन तडवी ने कहा है कि हैदराबाद गजट के अनुसार मराठा समाज को कुणबी प्रमाणपत्र देने के बारे में २ सितंबर २०२५ को राज्य सरकार ने निर्णय जारी किया है। इसी गजट का आधार लेकर राज्य के ‘बंजारा’ समाज ने अब अनुसूचित जनजाति वर्ग में समावेश करने की मांग की है। तडवी का कहना है कि यह मांग गलत और असंवैधानिक है।

भारतीय संविधान के अनुच्छेद ३४२ के अनुसार महाराष्ट्र राज्य के क्षेत्र से संबंधित ६ सितंबर १९५० को राष्ट्रपति के पहले आदेश में और उसके बाद महाराष्ट्र राज्य के संदर्भ में संसद द्वारा समय-समय पर किए गए संशोधनों के तहत अनुसूचित जनजातियों की सूचियाँ निर्धारित की गई हैं। इसमें ‘बंजारा’ का कोई उल्लेख नहीं है।

हैदराबाद गजट (१९०९) में पृष्ठ संख्या २३४ पर बंजारा का समावेश ‘अन्य महत्वपूर्ण कृषक जातियाँ’ के रूप में दी गई है। सन १९२० के गजट में लंबड़ा, बंजारा / सुगली का उल्लेख ‘भटकी जाति’ और ‘हिंदू की जाति’ के रूप में किया गया है। तडवी ने कहा कि इसी कारण से ये आदिवासी नहीं हो सकते और इन्हें आदिवासी का दर्जा नहीं मिल सकता।

डिप्रेस्ड क्लासेस ऐण्ड एबोरिजिनल ट्राईब्स कमिटी, बॉम्बे प्रेसीडेंसी (स्टार्ट कमिटी) में डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर भी सदस्य थे। इस समिति की सन १९३० की रिपोर्ट में अ. क्र. ५३ पर लमानी जाति को पिछड़ी जाति के रूप में सूचीबद्ध किया गया है। सन १९५३ में काकासाहेब कालेलकर की अध्यक्षता में पिछड़ा वर्ग आयोग की स्थापना की गई थी। इसमें मध्य भारत में अन्य पिछड़ा वर्ग जातियों की सूची में क्र. ५ पर ‘बंजारा’ जाति का उल्लेख है। मुंबई राज्य की सूची में ‘लंबड़ा’ जाति को अन्य पिछड़ा वर्ग की सूची में क्र. २१४ पर समाविष्ट किया गया है।

तडवी ने कहा कि महाराष्ट्र सरकार ने १२ जून १९७९ को ‘बंजारा’ जाति को अनुसूचित जनजाति की सूची में शामिल करने के लिए केंद्र सरकार को प्रस्ताव भेजा था। लेकिन ‘बंजारा’ समाज आदिवासियों के मानदंडों को पूरा नहीं करता, इस लिए राज्य सरकार ने ६ नवंबर १९८१ को अपना ही प्रस्ताव पूरी तरह से विचार के बाद वापस ले लिया था।

तडवी का कहना है कि केंद्र सरकार ने २६ फरवरी १९८१ को किसी जाति को अनुसूचित जनजाति में शामिल करने के लिए पांच मानदंड निर्धारित किए थे – प्राचीन जीवनशैली, भौगोलिक अलगाव, भिन्न संस्कृति, स्वभाव में संकोच, और पिछड़ापन। उन्होंने कहा कि ये मानदंड ‘बंजारा’ समाज पूरी नहीं करता और इसी कारण उन्हें आदिवासी का दर्जा नहीं मिल सकता।

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