नई दिल्ली (भारत): आदिवासी समाज की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और भाषाई पहचान को संरक्षित करने के उद्देश्य से फग्गन सिंह कुलस्ते ने सोमवार को संसद में गोंडी भाषा को संविधान की ८वीं अनुसूची में शामिल करने की मांग उठाई।
उन्होंने कहा कि गोंडी भाषा देश के विभिन्न राज्यों में व्यापक रूप से बोली जाती है और करोड़ों आदिवासी लोगों की मातृभाषा है, लेकिन आज भी इसे संवैधानिक मान्यता नहीं मिली है। गोंडी भाषा का इतिहास अत्यंत प्राचीन और समृद्ध है। यह भाषा न केवल संवाद का माध्यम है, बल्कि आदिवासी समाज की परंपराओं, लोककथाओं, गीत-संगीत और जीवनशैली से गहराई से जुड़ी हुई है। उन्होंने कहा कि यदि इस भाषा को ८वीं अनुसूची में शामिल किया जाता है, तो इसके संरक्षण, संवर्धन और शिक्षा में उपयोग को बढ़ावा मिलेगा।
उन्होंने सरकार से आग्रह किया कि गोंडी भाषा के विकास के लिए विशेष योजनाएं बनाई जाएं, जिसमें पाठ्यक्रम में शामिल करना, शोध कार्यों को प्रोत्साहन देना और डिजिटल माध्यमों पर इसे बढ़ावा देना शामिल हो। इससे आने वाली पीढ़ियों को अपनी भाषा और संस्कृति से जोड़ने में मदद मिलेगी।
कुलस्ते ने यह भी उल्लेख किया कि देश में कई भाषाओं को ८वीं अनुसूची में स्थान मिल चुका है। ऐसे में गोंडी जैसी महत्वपूर्ण आदिवासी भाषा को नजरअंदाज करना उचित नहीं है। उन्होंने कहा कि यह केवल एक भाषा का मुद्दा नहीं, बल्कि आदिवासी अस्मिता और पहचान से जुड़ा विषय है।
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